1. भूमिका: कबीरधाम की सूखी ज़मीन पर हरियाली की दस्तक
छत्तीसगढ़ का कबीरधाम जिला एक समय पानी की किल्लत, खेती में अस्थिरता और सीमित आजीविका विकल्पों से जूझता था। यह क्षेत्र मुख्यतः आदिवासी जनसंख्या से भरा है, जहाँ लोग वर्षा पर आधारित एकल फसल पर निर्भर रहते थे। पानी की कमी और भूमि की क्षीणता ने किसानों की जीवनशैली को सीमित कर दिया था। ऐसे में ज़रूरत थी एक दीर्घकालिक समाधान की, जो जल, जमीन और जन को जोड़कर स्थायित्व और समृद्धि की ओर ले जाए।
2. समाधान की दिशा: मेगा वाटरशेड कार्यक्रम की शुरुआत
2018 में भारत ग्रामीण आजीविका फाउंडेशन (BRLF) और राज्य सरकार के सहयोग से “High Impact Mega Watershed Project” की शुरुआत हुई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य था — “Ridge to Valley” मॉडल अपनाकर जल संरक्षण संरचनाएं तैयार करना, कृषि सुधारना और समुदाय को योजना की प्रक्रिया में सहभागी बनाना। योजना को ग्राम स्तर पर क्रियान्वित करने के लिए स्थानीय संस्थानों को सशक्त किया गया। यह पहल 206 गांवों में फैली, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी प्राथमिक केंद्र बन गई।
3. परिणामों की झलक: आँकड़ों में परिवर्तन की कहानी
कार्यक्रम के छह वर्षों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ सामने आईं। कुल 236 करोड़ रुपये का निवेश हुआ और 16,002 परिवारों को लाभ मिला। 2,796 हेक्टेयर नई भूमि पर सिंचाई की सुविधा पहुँची और जल स्तर में औसतन 1 से 1.5 मीटर की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई। फसल उत्पादन की तीव्रता 149% तक बढ़ी और लगभग 67% परिवारों की आय में वृद्धि हुई। ये आँकड़े बताते हैं कि यह योजना केवल संसाधन सुधार तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोगों की जिंदगी में भी बदलाव लाई।
| उपलब्धियाँ | आँकड़े |
|---|---|
| कुल निवेश | ₹236 करोड़ |
| लाभान्वित परिवार | 16,002 |
| अतिरिक्त सिंचित भूमि | 2,796 हेक्टेयर |
| जल स्तर में वृद्धि | 1–1.5 मीटर |
| कृषि उत्पादन वृद्धि | 149% तक |
| आय में वृद्धि | 67% किसान परिवार |
4. ज़मीन पर कार्य: संरचनाएँ और सामूहिक श्रम
प्रोजेक्ट के तहत गांवों में कई तरह की संरचनाएँ निर्मित की गईं — जैसे स्टॉपडैम, खेत तालाब, चेकडैम, कंटूर ट्रेंच, कुएं और पाइपलाइन सिंचाई प्रणाली। इनका उद्देश्य था — वर्षा जल का संरक्षण और भूजल स्तर को पुनःस्थापित करना। इन संरचनाओं के निर्माण में ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित की गई और “श्रमदान” के माध्यम से सामाजिक जुड़ाव को भी बढ़ावा मिला। इस प्रकार तकनीकी समाधान और स्थानीय ज्ञान को जोड़कर प्रभावी क्रियान्वयन हुआ।
5. महिला शक्ति की भूमिका
इस योजना की एक खास बात रही — महिलाओं की सक्रिय भागीदारी। स्वयं सहायता समूहों (SHG) की महिलाओं को संरचनाओं के निर्माण, सब्जी उत्पादन, प्रोसेसिंग और बाज़ार से जुड़ाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिला। इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ी बल्कि निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई। कई गांवों में महिला SHG ने बकरी पालन, मशरूम उत्पादन और मछली पालन जैसे वैकल्पिक व्यवसायों को भी अपनाया।
6. जल संरक्षण से खेती को मिला नया जीवन
इन संरचनाओं के परिणामस्वरूप वर्षा जल को संग्रहित करने और जमीन में नमी बनाए रखने में सफलता मिली। पहले जहाँ किसान केवल एक फसल लेते थे, अब वे दो से तीन फसलें उगा रहे हैं। मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, और भूजल स्तर में बढ़ोत्तरी ने सिंचाई की सुविधा को निरंतर बनाया है। जल संरक्षण से न केवल खेती में वृद्धि हुई, बल्कि गर्मियों के दौरान भी सब्जियों की खेती संभव हुई है।
7. वैकल्पिक आजीविका: मत्स्य पालन और बागवानी की ओर बढ़ते कदम
पानी की उपलब्धता ने किसानों को वैकल्पिक आय स्रोतों की ओर बढ़ने का अवसर दिया। कई गांवों में मछली पालन शुरू किया गया, जिससे किसानों को सालाना लाखों की आय हो रही है। साथ ही, बागवानी और सब्जी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण और बीज की आपूर्ति की गई। महिला समूहों ने स्वयं प्रसंस्करण इकाइयाँ शुरू कीं और पल्लवित फसलों से पल्प, अचार और अन्य उत्पाद तैयार किए।

8. संस्थागत मज़बूती और नेतृत्व में परिवर्तन
इस योजना ने ग्राम स्तरीय संस्थानों को मज़बूत किया। Jeevika Samiti, Cluster Facilitation Teams (CFT), SHGs और कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) ने ग्राम योजना, कार्यान्वयन और निगरानी में सशक्त भूमिका निभाई। ग्रामीणों को प्रशिक्षण दिया गया, जिससे वे जल संरचना निर्माण, रखरखाव और आजीविका प्रबंधन में आत्मनिर्भर बन सकें। यह भागीदारी मॉडल ने सामुदायिक स्वामित्व और उत्तरदायित्व को बढ़ावा दिया।
9. चुनौतियाँ और उनसे मिली सीख
कार्यक्रम के दौरान कई चुनौतियाँ आईं — जैसे तकनीकी जानकारी की कमी, सीमित सामुदायिक सहभागिता और बाजार तक पहुंच। लेकिन निरंतर प्रशिक्षण, संवाद और स्थानीय नेतृत्व को प्रोत्साहित कर इन समस्याओं का समाधान निकाला गया। SHG और FPO के माध्यम से बाजार से जुड़ाव बना, जिससे उत्पादों की बेहतर कीमत और नियमित बिक्री संभव हो सकी।
10. मॉडल, सभी लिए प्रेरणा
आज कबीरधाम का यह वाटरशेड मॉडल न केवल जल प्रबंधन की मिसाल है, बल्कि यह एक ऐसा उदाहरण है जहाँ पानी के संरक्षण ने आजीविका को नई दिशा दी। यह मॉडल दिखाता है कि जब समुदाय, सरकार और संस्थाएँ एक साथ काम करती हैं, तो परिवर्तन सिर्फ संभव नहीं, बल्कि स्थायी बनता है। कबीरधाम अब केवल पानी से हरित नहीं हुआ है, बल्कि यहां के लोग भी आर्थिक रूप से सशक्त और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर हो चुके हैं।
