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    कृषि मंथन

    जंगल की छांव में बसा जीवन: बैगा जनजाति और डोंगर खेती का लुप्त होता अस्तित्व

    vikasBy vikasJune 10, 2025No Comments4 Mins Read5 Views
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    जंगल के साथ सहजीवन की विरासत

    छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले की लोरमी तहसील के ग्राम राजक में निवास करने वाली बैगा जनजाति भारत की पारंपरिक और विशेष संरक्षित जनजातियों में से एक है। इनका जीवन जंगल पर आश्रित नहीं, बल्कि उससे गहराई से जुड़ा हुआ है। कहावत है – “जब कुछ नहीं था, तब जंगल था” – और यह वाक्य उनके जीवन के हर पहलू में सजीव रूप में नजर आता है। जंगल न केवल उनके भोजन, दवा और रोजगार का स्रोत रहा है, बल्कि उनकी संस्कृति, विश्वास और पहचान भी रहा है।

    बेवार (डोंगर) खेती: परंपरा, पोषण और पारिस्थितिकी का संगम

    बैगा समुदाय द्वारा की जाने वाली बेवार या डोंगर खेती एक प्रकार की स्थानांतरित कृषि पद्धति थी। यह खेती पहाड़ी क्षेत्रों में बिना हल चलाए की जाती थी, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी। इसमें 40-45 प्रकार के बीजों का मिश्रण बोया जाता था – जैसे कोदो, कुटकी, माड़िया, सांवा, सल्हीर, अरहर, बदरा आदि। इस मिश्रित कृषि पद्धति से खाद्य सुरक्षा, पोषण और जैव विविधता का संतुलन बना रहता था। बीजों का आदान-प्रदान भी समुदायों के बीच सहयोग और आत्मनिर्भरता को दर्शाता था।

    जंगल से जीवन, संस्कृति और आस्था की डोर

    बैगा समुदाय के लिए जंगल महज संसाधन नहीं, बल्कि उनके जीवन का केंद्र रहा है। सूखा, अकाल या विपदा के समय जंगल ने उन्हें सहारा दिया – महुआ, बेर, कंद-मूल जैसे वनोपज उनके भोजन का आधार बने। उनके सामाजिक रीति-रिवाज, त्योहार, और धार्मिक विश्वास भी जंगलों से जुड़े रहे हैं। कुछ वन क्षेत्रों को वे पवित्र मानते हैं और उन्हें पीढ़ियों से बिना काटे संरक्षित रखते आए हैं।

    परंपरागत औषधीय ज्ञान: जंगल ही इनका अस्पताल

    बैगा जनजाति जंगल को एक जीवित औषधालय मानती है। उनके वैद्य (परंपरागत चिकित्सक) जड़ी-बूटियों और झाड़-फूंक के माध्यम से उपचार करते रहे हैं। पेट दर्द, बुखार, मलेरिया, सूजन, पथरी जैसी बीमारियों के लिए वे पेड़ों की छाल, पत्तियां, जड़ें और कंदों का उपयोग करते थे। लेकिन वन कटाई और बाजार में औषधीय पौधों की अवैध बिक्री के कारण कई दुर्लभ वनस्पतियाँ अब लुप्त हो रही हैं। इसके परिणामस्वरूप युवा पीढ़ी पारंपरिक चिकित्सा से दूर हो रही है और बाहरी चिकित्सा संस्थानों पर निर्भर होती जा रही है।

    बदलाव की आहट: जंगल से विस्थापन और पहचान का संकट

    वनों के राष्ट्रीयकरण के बाद बैगा समुदाय को उनके पारंपरिक डोंगर क्षेत्रों से नीचे बसाया गया। इस कदम ने न केवल उनकी कृषि प्रणाली को तोड़ा, बल्कि खान-पान, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता को भी गहरा आघात पहुंचाया। बेवार खेती प्रतिबंधित हो गई, जिससे मोटे अनाज और स्थानीय बीज लुप्त हो गए, पोषण सुरक्षा कमजोर हुई और पारिस्थितिक ज्ञान धीरे-धीरे खत्म होने लगा।

    डोंगर खेती: इतिहास की ओर

    आज की स्थिति में डोंगर खेती लगभग इतिहास बन चुकी है। जंगल से उनका संबंध कमजोर हुआ है और पारंपरिक जीवनशैली बाजार आधारित व्यवस्था में विलीन हो रही है। खेती, औषधि और सामाजिक संगठन की स्वायत्तता जो एक समय गांवों की पहचान थी, अब केवल बुजुर्गों की यादों में रह गई है।

    क्या खो रहा है भारत?

    बैगा समुदाय की यह कहानी सिर्फ एक जनजाति की नहीं है, यह उस गहराई से जुड़े जीवन दर्शन की कहानी है जो प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित है। यदि हम इस पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित नहीं करते, तो हम न केवल एक समुदाय की पहचान, बल्कि एक संपूर्ण जैव-सांस्कृतिक विरासत खो देंगे।



    बैगा जनजाति और डोंगर खेती की यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिकता के नाम पर हमने क्या खोया है। यह आवश्यक है कि ऐसे समुदायों की पारंपरिक कृषि, चिकित्सा और सांस्कृतिक प्रणालियों को दस्तावेजित किया जाए, उन्हें संरक्षित किया जाए और नई पीढ़ी को इससे जोड़ा जाए – ताकि हमारे जंगल, हमारी विविधता और हमारी जड़ें जीवित रह सकें।

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