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    स्वराज मंथन

    वडसगांव: जब युवाओं ने जंगल को मरने नहीं दिया

    vikasBy vikasJune 11, 2025Updated:August 27, 2025No Comments3 Mins Read8 Views
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    1. पर्यावरण संकट की दस्तक

    छत्तीसगढ़ राज्य के सक्ती जिले के वडसगांव नामक एक छोटे से गांव में जंगल की कटाई और जल स्रोतों के सूखने जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही थीं। हरी लकड़ियों की बेतरतीब कटाई और जंगल से जुड़ी सामाजिक चेतना के लोप हो जाने के कारण गांव का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगा था। गांव के बुजुर्गों और युवाओं को यह महसूस होने लगा कि यदि इसी तरह चलता रहा तो अगली पीढ़ी को न पीने का पानी मिलेगा और न ही शुद्ध हवा।

    2. एक शिक्षक की पहल और सामूहिक चेतना का जागरण

    जनवरी 2024 में गांव के एक शिक्षक श्री दिनेश फुण्डा ने पहल की और कुछ युवा साथियों के साथ मिलकर एक सामूहिक बैठक आयोजित की। इस बैठक में उन्होंने गांववालों से केवल एक सवाल पूछा – “अगर जंगल पूरी तरह खत्म हो गया, तो हमारे बच्चों का क्या होगा?” यह सवाल गांववालों के दिलों को छू गया और वहां से जंगल बचाने का संकल्प लिया गया। सामूहिक चर्चा के बाद तीन महत्वपूर्ण नियम तय किए गए: कोई भी व्यक्ति जंगल से हरी लकड़ी नहीं काटेगा, नियम तोड़ने पर ₹10,000 का जुर्माना लगेगा, और जंगल से नरों की कटाई पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगी।

    3. निगरानी तंत्र की स्थापना और अनुशासन का पालन

    गांव में ‘बैंगा पाहरी’ नाम से एक निगरानी समिति बनाई गई, जिसमें प्रतिदिन दस घरों से एक-एक व्यक्ति जंगल की गश्त करता है। यह गश्ती दल यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी नियम का उल्लंघन न करे। हर महीने की पहली और पंद्रहवीं तारीख को गांव में सामूहिक समीक्षा बैठक होती है, जिसमें इन नियमों के क्रियान्वयन की समीक्षा की जाती है और आवश्यक संशोधन भी तय किए जाते हैं।

    4. जल, जंगल और जीवन में बदलाव की शुरुआत

    इस सामूहिक प्रयास का प्रभाव कुछ ही महीनों में दिखाई देने लगा। सूख चुके जल स्रोतों में पानी लौटने लगा, पेड़-पौधे फिर से पनपने लगे और जंगल की हरियाली वापस आने लगी। लोगों ने जंगल के महत्व को समझा और अपने व्यवहार में परिवर्तन लाया। वन्यजीवों की वापसी और दुर्लभ वनस्पतियों जैसे भकभों, कचनार, भिलावा आदि का पुनः उगना इस परिवर्तन का प्रमाण बना। गांव का वातावरण पहले से अधिक शुद्ध और संतुलित हो गया।

    5. अन्य गांवों के लिए प्रेरणा: सामुदायिक नेतृत्व का मॉडल

    वडसगांव का यह प्रयास केवल पर्यावरण की रक्षा भर नहीं है, यह ग्रामीण नेतृत्व, सामूहिक चेतना और युवा सहभागिता का एक प्रेरणादायक उदाहरण है। गांव के लोग अब स्वयं अपने जंगल की रक्षा कर रहे हैं और उनका यह मॉडल आसपास के गांवों में भी अनुकरणीय बन रहा है। इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि जब समुदाय जागरूक हो और नेतृत्व जमीनी स्तर से हो, तो किसी भी पर्यावरणीय संकट से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है। वडसगांव ने दिखा दिया कि जंगल बचाने का रास्ता बाहर से नहीं, भीतर से ही निकलता है।

    Chhattisgarh Community forest right
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