1. जंगल से जुड़ा जीवन: खमढोड़गी गांव का परिचय
उत्तर बस्तर कांकेर जिले की ग्राम पंचायत कोकपुर में स्थित खमढोड़गी एक आदिवासी बहुल गांव है, जहां लगभग 140 परिवार रहते हैं। इन परिवारों की आजीविका मुख्यतः कृषि और वनों पर आधारित है। खेतों में एक फसल लेने के बाद, ग्रामीण वनों से निस्तारी (घरेलू उपयोग) और लघु वनोपज पर निर्भर रहते हैं। वर्षों से जंगल इनके जीवन का हिस्सा रहा, लेकिन सामुदायिक वन अधिकार (CFRR) की दिशा में पहल 2018 से शुरू हुई।
2. अधिकार की ओर पहला कदम: जागरूकता और आवेदन प्रक्रिया
वर्ष 2018 तक ग्रामीणों को सामुदायिक वन अधिकार अधिनियम (2006) की जानकारी नहीं थी। कोया भूमकाल क्रांति सेना (KBKS) की टीम ने गांव आकर कानून की जानकारी दी और ग्राम सभा को जागरूक कर आवेदन प्रक्रिया में सहयोग किया। युवाओं, विशेषकर टूपेश पोटाई जैसे लोगों की सक्रियता से ग्रामसभा में चर्चा प्रारंभ हुई और अधिकार की मांग उठाई गई।
3. जब नर्सरी ने दिखाई दिशा: अधिकार की जरूरत क्यों महसूस हुई?
वर्ष 2018 में वन विभाग द्वारा जंगल क्षेत्र में बांस की नर्सरी स्थापित की गई। इस दौरान ग्रामीणों की पारंपरिक पहुंच और उपयोग पर रोक लगाई गई। इससे गांववालों को यह एहसास हुआ कि जिस जंगल पर वे पीढ़ियों से निर्भर हैं, उस पर अब उनका कोई औपचारिक अधिकार नहीं है। यह स्थिति सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR) को समझने और प्राप्त करने की आवश्यकता को और भी मजबूत कर गई।
4. सीमा विवाद और समाधान की मिसाल
खमढोड़गी की परंपरागत सीमाएं पांच अन्य गांवों – मंडरी, कृष्ठीकुर, बर्देवारी, कोकपुर और चिवरांग – से जुड़ी हुई थीं। जब अधिकार दावा दायर किया गया, तो सीमा विवाद उत्पन्न हुआ। ग्रामसभा ने संयुक्त बैठकें आयोजित कर चार-चार बार चर्चा की और पारंपरिक उपयोग के आधार पर सहमति बनवाई। यह उदाहरण सामूहिक संवाद और सहमति से विवाद निपटारे का एक उत्कृष्ट मॉडल है।
5. अधिकार प्राप्ति और संवैधानिक मान्यता
लगातार दो महीनों की प्रक्रिया और गांवों की सहमति के बाद, 9 अगस्त 2020 को ग्रामसभा खमढोड़गी को 913.95 हेक्टेयर जंगल पर सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्राप्त हुआ। इसके तहत उन्हें जंगल के संरक्षण, पुनर्जीवन और सतत प्रबंधन का अधिकार मिला – यह FRA की धारा 3(1)(ख) और PESA की धारा 4(m)(ii) के तहत कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है।

6. अधिकार से आगे: प्रबंधन की दिशा में ग्रामसभा की पहल
2020 से 2022 के बीच ग्रामीणों को अगली कार्यवाही को लेकर स्पष्टता नहीं थी। लेकिन 2022 में SBI फाउंडेशन के सहयोग से ‘ग्राम सेवा कार्यक्रम’ के तहत समर्थन संस्था ने प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दी। इसके बाद ग्रामसभा ने वन प्रबंधन समिति का गठन कर जिम्मेदारी संभाली और सतत उपयोग की दिशा में कार्ययोजना तैयार की।
7. जंगल का नक्शा और कार्ययोजना
गांव को 6 वन क्षेत्रों में विभाजित किया गया:
| क्षेत्र | हेक्टेयर | योजना |
|---|---|---|
| जामपानी | 14 | महुआ, टेंडू, चार, हर्रा |
| कोटेवा डोंगरी | 127 | नीलगिरी वृक्षारोपण |
| नर्सरी क्षेत्र | 318 | बांस |
| एकाट जंगल | 64 | सीताफल, महुआ |
| फर्सू | 69 | चराई, सीताफल |
| अन्य | 308 | कृषि/आवास |
यह योजना वनों की सुरक्षा, वनोपज संवर्धन और जल संरक्षण को साथ लेकर चली जा रही है।
8. ‘एक पेड़ एक साथी’: जन-जागरूकता से संरक्षण तक
गांव में ‘एक पेड़ एक साथी’ अभियान चलाया गया, जिसमें प्रत्येक ग्रामीण ने अपने नाम से पेड़ लगाया और 400 रुपये खुद खर्च कर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ली। इस अभियान से 400 से अधिक पेड़ लगाए गए, जिससे जंगल से भावनात्मक जुड़ाव और संरक्षण में सहभागिता बढ़ी।

9. जल संरक्षण: जंगल से नमी, तालाब से सिंचाई
गांव में जल संरक्षण को लेकर उल्लेखनीय कार्य किए गए:
- 50 तालाब, 1 स्टॉप डैम
- 12 हेक्टेयर कंटूर ट्रेंच, 100 डाइक, 13 एलबीएस
- स्कूलों और आंगनबाड़ियों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग
- हर घर में रिचार्ज पिट निर्माण
इनसे भू-जल स्तर में सुधार हुआ, जिससे सब्जी उत्पादन, खेती और मछली पालन संभव हुआ।
10. आजीविका विकास की कहानियाँ
(क) इमारती लकड़ी और आमदनी
ग्रामसभा ने प्रस्ताव पारित कर नीलगिरी की लकड़ी बेची। एक नियम तय किया – 100 लकड़ी के बदले 200 फलदार पौधे लगाए जाएंगे। अब तक ₹1 लाख की लकड़ी बेची गई।
(ख) मछली पालन
जल संरक्षण के कारण 45 किसानों की आय ₹33.06 लाख बढ़ी है। यह गांव के सात समूहों द्वारा सामूहिक मछली पालन से संभव हुआ।
(ग) सिताफल पल्प से महिला आय
SHG ने सिताफल की प्रोसेसिंग कर 2,800 किलोग्राम पल्प का उत्पादन किया, जिससे ₹4.61 लाख का लाभ हुआ।
(घ) महुआ और इमली से व्यापार
10 महिलाओं की टीम ने महुआ और इमली की छंटाई, संग्रहण, भंडारण और बिक्री की। दो वर्षों में ₹4.36 लाख की उपज प्रोसेस की गई।
11. प्रेरणादायक अनुभव: शैक्षणिक भ्रमण
28 नवंबर 2024 को सरगुजा जिले से युवाओं का एक दल गांव आया। उन्होंने जंगल, जल और आजीविका विकास के कार्यों को देखा और ग्रामवासियों से संवाद किया। यह भ्रमण अन्य गांवों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया।
12. पर्यटन में संभावनाएँ: बैंबू राफ्टिंग का नया रोमांच
अब खमढोड़गी गांव बैंबू राफ्टिंग के लिए प्रसिद्ध हो रहा है। ₹100 की न्यूनतम दर पर राफ्टिंग सुविधा शुरू की गई है, जिससे गांव को नया रोजगार और पहचान मिली है। यह पर्यटन पहल साहसिक गतिविधियों के साथ-साथ स्थानीय आजीविका को नया आधार दे रही है।
निष्कर्ष: एक गांव, अनेक प्रेरणाएँ
खमढोड़गी गांव आज वन संरक्षण, जल प्रबंधन और आजीविका संवर्धन का प्रेरणादायक मॉडल बन गया है। सामुदायिक भागीदारी, कानूनी अधिकार और ग्राम सभा की सक्रियता से यह गांव ‘रोफरा ग्राम’ के रूप में नई पहचान बना रहा है। यहां की कहानी दर्शाती है कि जब सामुदायिक शक्ति, योजना और सतत प्रयास मिलते हैं, तो गांव आत्मनिर्भरता की ओर दृढ़ता से अग्रसर हो सकता है।
