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    आज की बात

    ग्राम कुसुमकसा की महिलाएं: संगठित व्यापार से आत्मनिर्भरता की ओर एक साहसिक कदम

    vikasBy vikasJuly 31, 2025Updated:August 27, 2025No Comments3 Mins Read9 Views
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    Forest Based Livelihoods
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    1. पृष्ठभूमि और संदर्भ

    ग्राम कुसुमकसा, विकासखंड अंबागढ़ चौकी, छत्तीसगढ़ का एक आदिवासी बहुल गांव है। यह इलाका जैव विविधता से समृद्ध है, जहां की महिलाएं वर्षों से ईमली, महुआ, बेर, हर्र, बहेरा जैसे लघु वनोपजों का संग्रहण करके आजीविका चलाती रही हैं। लेकिन पारंपरिक तरीकों में बिचौलियों की भूमिका, मूल्य निर्धारण में अनभिज्ञता और बाज़ार से दूरी के कारण ये महिलाएं आर्थिक रूप से पिछड़ी रह जाती थीं।

    2. बदलाव की शुरुआत: ग्राम सभा से उठी उम्मीद की लौ

    मार्च 2024 में एक ग्राम सभा का आयोजन हुआ, जिसमें महिला समूहों के साथ पंचायत प्रतिनिधि, वन विभाग अधिकारी और बिहान मिशन की टीम ने भाग लिया। इस चर्चा में पहली बार यह विचार सामने आया कि यदि महिलाएं मिलकर संगठित रूप से संग्रहण और विपणन करें, तो वे सीधे बाजार से जुड़कर बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकती हैं। यह बैठक महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।

    3. प्रशिक्षण और सामूहिक पहल की तैयारी

    ग्राम सभा के बाद महिला स्व-सहायता समूहों के साथ विशेष बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में उन्हें संगठित खरीद-विक्रय, मूल्य निर्धारण, मुनाफा गणना और स्थानीय व्यापारियों से सीधा संपर्क स्थापित करने की रणनीति सिखाई गई। महिलाओं ने इसमें उत्साहपूर्वक भाग लिया और अपने समूहों को आर्थिक गतिविधियों के लिए तैयार करना शुरू किया।

    4. महिला उत्पादक समूह का गठन

    अप्रैल 2024 में तीन सक्रिय महिला स्व-सहायता समूहों की सहभागिता से ‘महिला उत्पादक समूह’ का गठन हुआ। पहले ये महिलाएं महज़ घरेलू कामकाज और छोटी मजदूरी (₹40/माह) तक सीमित थीं। लेकिन अब उन्होंने संगठित व्यापार की दिशा में कदम बढ़ाया। ग्राम के सरपंच, व्यापारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से स्थानीय उपज की खरीद के लिए ठोस संपर्क बनाए गए।

    5. व्यापार की शुरुआत और शुरुआती चुनौतियां

    अप्रैल 2025 से महिला समूहों ने ग्राम चौक पर सप्ताह में एक बार खरीदी दुकान लगाना शुरू किया, जहाँ गांव की महिलाएं ईमली, महुआ, बेर जैसे उपज बेचने लगीं। यह व्यापारिक पहल धीरे-धीरे गति पकड़ रही थी, लेकिन इस बीच स्थानीय कोचियों (बिचौलियों) ने विरोध शुरू कर दिया। उन्होंने महिलाओं पर दबाव बनाकर खरीद-बिक्री रोकने की कोशिश की।

    6. पंचायत और ग्राम सभा की निर्णायक भूमिका

    महिलाओं ने धैर्य और रणनीति से काम लिया। उन्होंने ग्राम सभा में औपचारिक प्रस्ताव लाकर पंचायत से मदद मांगी। पंचायत ने गांव के हित में निर्णय लेते हुए यह घोषणा की कि कोचिए गांव में दुकान नहीं लगाएंगे, और महिला समूहों को प्राथमिकता दी जाएगी। यह पंचायत का ऐतिहासिक निर्णय था जिसने महिला समूहों को सुरक्षित और सम्मानित व्यापारिक स्थान दिलाया।

    7. व्यापारिक उपलब्धियां और आर्थिक परिणाम

    महिला उत्पादक समूह ने अब तक (जून 2025 तक) निम्नलिखित खरीद-बिक्री की:

    • ईमली – 8 क्विंटल
    • बेर – 6 क्विंटल
    • महुआ – 1 क्विंटल

    कुल व्यापार: ₹61,600/-
    यह प्रयास ग्राम हिमाभरण परियोजना के अंतर्गत प्रोत्साहन के रूप में भी मान्यता प्राप्त कर चुका है। इससे महिलाओं को न केवल आजीविका में मजबूती मिली, बल्कि उन्होंने संगठित निर्णय लेने और नेतृत्व कौशल भी अर्जित किया।

    8. सीख और संभावनाएँ

    ग्राम कुसुमकसा की यह कहानी दिखाती है कि जब महिलाओं को सही जानकारी, सहयोग और मंच मिलता है, तो वे स्थानीय संसाधनों के सहारे आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर सशक्त कदम उठा सकती हैं। महिला उत्पादक समूह का यह मॉडल अन्य गांवों में भी प्रतिरेपण (Replication) योग्य है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नारी शक्ति की निर्णायक भूमिका और अधिक सशक्त हो सके।

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