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    महिला सशक्तिकरण

    छत्तीसगढ़ में निर्णय–निर्माण की शक्ति बनाम प्रतिनिधित्व

    vikasBy vikasMarch 4, 2026No Comments5 Mins Read16 Views
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    प्रतिनिधित्व हमेशा शक्ति नहीं होता

    पिछले दो दशकों में छत्तीसगढ़ ने स्थानीय स्वशासन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। पंचायती राज संस्थान में 50 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद ग्राम, जनपद और जिला स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति आधे से अधिक हो चुकी है। लगभग 1,70,000 निर्वाचित प्रतिनिधियों में से लगभग 93,000 महिलाएँ हैं, जो कुल का लगभग 55 प्रतिशत है। यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

    फिर भी यह महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है कि क्या यह प्रतिनिधित्व वास्तविक निर्णय–निर्माण की शक्ति में भी परिवर्तित हुआ है? अनेक मामलों में महिलाएँ औपचारिक रूप से पद पर हैं, लेकिन सामाजिक, संस्थागत और प्रशासनिक अवरोध उनकी प्रभावशीलता को सीमित करते हैं।


    प्रॉक्सी नेतृत्व और अनौपचारिक पुरुष नियंत्रण

    स्थानीय शासन में महिलाओं के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों में से एक “सरपंच पति” या प्रॉक्सी नेतृत्व की प्रवृत्ति है। कई स्थानों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के स्थान पर उनका पति या अन्य पुरुष रिश्तेदार बैठकों में भाग लेते हैं, अधिकारियों से संवाद करते हैं और निर्णयों को प्रभावित करते हैं।

    हालाँकि समय के साथ यह प्रवृत्ति घट रही है, विशेषकर दूसरी बार चुनी गई महिला प्रतिनिधियों में, फिर भी यह वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण के मार्ग में बाधा बनी हुई है।


    वित्तीय निर्णयों पर सीमित नियंत्रण

    महिलाओं के सामने एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती वित्तीय निर्णय–निर्माण में सीमित भागीदारी है। पंचायत बजट तैयार करना, विकास निधि का आवंटन, ठेकेदार चयन और अधोसंरचना परियोजनाओं की स्वीकृति जैसे विषयों में अक्सर पुरुष प्रतिनिधियों या स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों का प्रभाव अधिक रहता है।

    महिला प्रतिनिधियाँ प्रायः पेयजल, पोषण, स्वच्छता, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, जबकि बड़े वित्तीय संसाधनों से जुड़े क्षेत्रों में उनका नियंत्रण अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।


    प्रशासनिक और संस्थागत बाधाएँ

    पंचायत प्रतिनिधियों को ब्लॉक और जिला स्तर के अधिकारियों—जैसे इंजीनियर, विकास अधिकारी और राजस्व अधिकारियों—के साथ नियमित संवाद करना पड़ता है। सीमित प्रशासनिक अनुभव या औपचारिक शिक्षा के कारण कई महिला प्रतिनिधियों को इन प्रक्रियाओं को समझने और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में कठिनाई होती है।

    जटिल प्रक्रियाएँ, तकनीकी शब्दावली और पुरुष-प्रधान प्रशासनिक वातावरण उनकी सक्रिय भागीदारी को प्रभावित कर सकता है। डिजिटल शासन प्रणालियों के विस्तार के साथ यह चुनौती और बढ़ सकती है यदि पर्याप्त प्रशिक्षण न दिया जाए।


    शासन भूमिकाओं का लैंगिक विभाजन

    मैदानी अनुभव बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के कई जिलों—विशेषकर बस्तर, दंतेवाड़ा और सरगुजा जैसे आदिवासी क्षेत्रों—में महिला प्रतिनिधियाँ सामाजिक विकास से जुड़े क्षेत्रों में अधिक सक्रिय रहती हैं।

    वे पेयजल प्रबंधन, स्वच्छता अभियान, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों तथा शिक्षा निगरानी में नेतृत्व करती हैं। इसके विपरीत सड़क निर्माण, भवन निर्माण या सिंचाई परियोजनाओं जैसे बड़े तकनीकी कार्यों में पुरुषों की प्रधानता बनी रहती है। यह शासन भूमिकाओं के लैंगिक विभाजन को दर्शाता है।


    क्षमता, सूचना और डिजिटल अंतर

    कई महिला प्रतिनिधियों के पास शासन प्रणाली का पूर्व अनुभव नहीं होता। इससे उन्हें सरकारी योजनाओं की दिशा-निर्देश समझने, वित्तीय विवरणों की व्याख्या करने और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने में कठिनाई हो सकती है।

    यदि निरंतर प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाएँ, तो यह अंतर धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।


    सामाजिक मानदंड और गतिशीलता की सीमाएँ

    ग्रामीण समाज में पारंपरिक अपेक्षाएँ महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी को प्रभावित करती हैं। ब्लॉक या जिला मुख्यालय तक यात्रा करना, देर शाम बैठकों में भाग लेना या बड़े सार्वजनिक मंचों पर बोलना कई स्थानों पर अभी भी सामाजिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

    ये सीमाएँ महिलाओं की दृश्यता और प्रभाव क्षेत्र को सीमित कर सकती हैं।


    आदिवासी महिला नेताओं की अंतर्संबंधी चुनौतियाँ

    छत्तीसगढ़ की लगभग 31 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग से है, और बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएँ स्थानीय निकायों में निर्वाचित हैं। यद्यपि आदिवासी समुदायों में महिलाओं की सामुदायिक भागीदारी अपेक्षाकृत मजबूत होती है, फिर भी औपचारिक शासन ढाँचे में भाषा, भौगोलिक दूरी और संस्थागत सहयोग की कमी जैसी चुनौतियाँ सामने आती हैं।

    इसके बावजूद, वनाधिकार, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और सामुदायिक विकास जैसे विषयों पर आदिवासी महिला नेताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।


    उभरती सकारात्मक प्रवृत्तियाँ

    समय के साथ कई सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। दूसरी और तीसरी बार निर्वाचित महिला प्रतिनिधियाँ अधिक आत्मविश्वास के साथ निर्णय ले रही हैं। स्वयं सहायता समूहों और सामुदायिक संगठनों से जुड़ी महिलाएँ राजनीतिक नेतृत्व में अधिक सक्षम सिद्ध हो रही हैं, क्योंकि वे पहले से ही वित्तीय प्रबंधन और सामूहिक निर्णय–निर्माण का अनुभव रखती हैं।

    सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे क्षमता-विकास कार्यक्रम भी महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को सुदृढ़ कर रहे हैं।


    निष्कर्ष

    छत्तीसगढ़ ने जमीनी स्तर पर महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। लगभग 55 प्रतिशत सीटों पर महिलाओं की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

    फिर भी प्रतिनिधित्व से वास्तविक निर्णय–निर्माण की शक्ति तक की यात्रा अभी जारी है। सामाजिक मानदंड, संस्थागत अवरोध और क्षमता संबंधी अंतर इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। यदि महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय अधिकार, संस्थागत सहयोग और सामूहिक मंचों से जोड़ा जाए, तो प्रतिनिधित्व को वास्तविक शासन शक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। यही भविष्य की नीति दिशा होनी चाहिए।

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