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    महिला सशक्तिकरण

    छत्तीसगढ़ में ग्रामीण परिवर्तन की उत्प्रेरक महिलाएँ:लोक विकास कार्यक्रमों के संदर्भ में एक कथात्मक विश्लेषण

    vikasBy vikasMarch 4, 2026No Comments4 Mins Read11 Views
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    सारांश
    छत्तीसगढ़ के ग्रामीण परिदृश्य में महिलाएँ विकास की केंद्रीय धुरी के रूप में उभरकर सामने आई हैं, यद्यपि उनके योगदान को अक्सर पर्याप्त मान्यता नहीं मिलती। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत मिशन तथा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में महिलाओं की भूमिका श्रम सृजन, सामुदायिक संस्थागत प्रबंधन, स्वच्छता व्यवहार परिवर्तन और आजीविका संवर्द्धन के रूप में स्पष्ट दिखाई देती है। आँकड़े दर्शाते हैं कि मनरेगा में राज्य के कुल मानव-दिवसों में महिलाओं की हिस्सेदारी आधे से अधिक है, जबकि बिहान के अंतर्गत लगभग 2.8 लाख स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी लगभग 30 लाख महिलाएँ आर्थिक गतिविधियों में संलग्न हैं। इसके बावजूद महिलाएँ प्रायः श्रम-प्रधान और कम पारिश्रमिक वाले कार्यों तक सीमित रहती हैं। यह लेख महिलाओं के योगदान का विश्लेषण करते हुए संरचनात्मक चुनौतियों और लैंगिक रूपांतरण की संभावनाओं को रेखांकित करता है।

    ग्रामीण विकास की प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन का विषय है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला श्रम बल भागीदारी दर में सुधार दर्ज किया गया है, किंतु रोजगार की गुणवत्ता, आय की स्थिरता और अनौपचारिक श्रम की अधिकता जैसे प्रश्न अभी भी जटिल बने हुए हैं। छत्तीसगढ़ इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ महिलाएँ केवल लाभार्थी नहीं बल्कि योजनाओं की वास्तविक संचालक और कार्यान्वयनकर्ता हैं। रोजगार सृजन से लेकर जल प्रबंधन, स्वच्छता और सामूहिक उद्यमिता तक—हर क्षेत्र में उनकी सक्रिय उपस्थिति देखी जा सकती है।

    मनरेगा के अंतर्गत छत्तीसगढ़ में महिलाओं ने ग्रामीण मजदूरी आधारित अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया है। वित्तीय वर्ष 2025–26 के प्रशासनिक आँकड़ों के अनुसार महिलाओं ने लगभग 295 लाख मानव-दिवस सृजित किए, जो पुरुषों की तुलना में अधिक है। सिंचाई सुविधाओं का निर्माण, परंपरागत जल स्रोतों का जीर्णोद्धार तथा जल संरक्षण कार्यों में उनकी सक्रियता ने कृषि उत्पादकता और घरेलू पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ किया है। फिर भी, अधिकांश महिलाएँ अकुशल श्रम की श्रेणी में सीमित हैं और पर्यवेक्षक या अर्ध-तकनीकी भूमिकाओं में उनकी उपस्थिति नगण्य है। भुगतान में विलंब और बैंकिंग प्रक्रियाओं की जटिलताएँ भी आर्थिक सशक्तिकरण को सीमित करती हैं।

    जल जीवन मिशन के माध्यम से महिलाओं की भूमिका जल उपभोक्ता से जल प्रबंधक तक विस्तृत हुई है। ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों में 50 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व का प्रावधान एक महत्वपूर्ण संस्थागत परिवर्तन है। ‘जल बहिनी’ जैसी पहलों के माध्यम से लाखों महिलाएँ जल गुणवत्ता परीक्षण, पाइपलाइन निगरानी और समुदाय जागरूकता में संलग्न हैं। इससे जल शासन में लैंगिक संतुलन स्थापित हुआ है। हालांकि तकनीकी प्रशिक्षण, प्रमाणन और स्पष्ट पारिश्रमिक संरचना के अभाव में उनकी भूमिका कई बार प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है।

    बिहान के रूप में संचालित राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने महिलाओं के आर्थिक सामूहिकीकरण को व्यापक आधार दिया है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बचत, आंतरिक ऋण, सूक्ष्म उद्यम और विभिन्न योजनाओं के साथ अभिसरण ने ग्रामीण महिलाओं को वित्तीय समावेशन की मुख्यधारा से जोड़ा है। फिर भी अधिकांश उद्यम स्थानीय बाजार तक सीमित हैं। ब्रांडिंग, पैकेजिंग, पूंजी निवेश और बाजार संपर्क की कमी उनके विस्तार में बाधा बनती है। सक्रिय समूह नेताओं पर योजनागत दायित्वों का अतिरिक्त भार भी देखा जाता है।

    स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत महिलाओं ने व्यवहार परिवर्तन और कचरा प्रबंधन प्रणालियों में अग्रणी भूमिका निभाई है। विशेषकर अंबिकापुर जैसे क्षेत्रों में महिला-नेतृत्व वाली विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली ने स्वच्छता को आजीविका के अवसर में बदला है। इसके बावजूद सामाजिक कलंक, स्वास्थ्य जोखिम और अनियमित भुगतान जैसी समस्याएँ इस क्षेत्र में स्थायित्व को प्रभावित करती हैं।

    इन सभी कार्यक्रमों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ में ग्रामीण शासन की परिचालन संरचना का स्त्रीकरण हो चुका है। महिलाएँ रोजगार सृजन से लेकर जल और स्वच्छता प्रबंधन तथा सामूहिक उद्यम तक हर स्तर पर सक्रिय हैं। किंतु उनकी उच्च भागीदारी समान रूप से उच्च आर्थिक प्रतिफल में परिवर्तित नहीं हुई है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि मात्र सहभागिता पर्याप्त नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण सहभागिता आवश्यक है।

    लैंगिक रूपांतरण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए नीतिगत ढाँचे में कुछ रणनीतिक सुधार अपेक्षित हैं—तकनीकी कौशल का औपचारिक प्रमाणन, सेवा अनुबंधों का संस्थागत प्रावधान, मनरेगा में अर्ध-तकनीकी भूमिकाओं में महिलाओं की पदोन्नति, उद्यम विस्तार हेतु बाजार संपर्क और डिजिटल एकीकरण, तथा स्वयंसेवी मॉडल के स्थान पर संरचित पारिश्रमिक व्यवस्था।

    अंततः, छत्तीसगढ़ में महिलाओं ने यह सिद्ध किया है कि वे ग्रामीण विकास की निष्क्रिय लाभार्थी नहीं, बल्कि परिवर्तन की सृजनकर्ता हैं। यदि उनकी भूमिका को औपचारिक मान्यता, कौशल उन्नयन और उचित पारिश्रमिक से जोड़ा जाए, तो राज्य की ग्रामीण विकास यात्रा वास्तव में लैंगिक रूप से रूपांतरित मॉडल बन सकती है। महिलाओं की भागीदारी को संख्या से गुणवत्ता की ओर ले जाना ही आगामी चरण की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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