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    स्वराज मंथन

    उरमापाल: जंगल से जुड़ाव, अधिकार की जीत

    vikasBy vikasJuly 18, 2025Updated:August 27, 2025No Comments3 Mins Read7 Views
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    1303 हेक्टेयर जंगल पर मिला सामुदायिक वन संसाधन अधिकार — आदिवासी समुदाय के आत्म-सशक्तिकरण की प्रेरक कहानी

    ग्राम: उरमापाल | विकासखंड: छिंदगढ़ | जिला: सुकमा, छत्तीसगढ़


    पारंपरिक जंगल, अब वैधानिक अधिकार

    सुकमा जिले के छिंदगढ़ विकासखंड का आदिवासी ग्राम उरमापाल — जहां पीढ़ियों से जंगल जीवन और आजीविका का केंद्र रहा है। “घनी जंगल” के नाम से मशहूर इस क्षेत्र का वन, वर्षों तक गांव की आजीविका और संस्कृति का स्रोत रहा। लेकिन समय के साथ यह वन वन विभाग के नियंत्रण में आ गया, जिससे समुदाय का पारंपरिक उपयोग बाधित हो गया।

    वन अधिकार अधिनियम 2006 (Forest Rights Act – FRA) ने इस व्यवस्था को चुनौती दी और समुदायों को उनके परंपरागत वन संसाधनों पर सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR) प्राप्त करने का अवसर दिया।


    संघर्ष की चिंगारी बनी सामूहिक चेतना

    वर्ष 2019-20 में जब स्थानीय संस्थाएं, जैसे नवोदित संस्था एवं आदिवासी विकास प्रशिक्षण केंद्र, गांव में जागरूकता लाए, तब समुदाय को पहली बार यह एहसास हुआ कि उनके पास अपने जंगल पर फिर से अधिकार पाने का संवैधानिक रास्ता है।

    गांव में बदलाव की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू हुई:

    • महिलाओं ने प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदारी शुरू की
    • पारंपरिक उपयोग, नक्शांकन, दस्तावेजीकरण में स्थानीय लोग शामिल हुए
    • ग्रामसभा और वन अधिकार समितियों को सक्रिय किया गया
    • अन्य CFRR प्राप्त गांवों से प्रेरणा लेकर रणनीति तैयार की गई

    संयुक्त महाग्रामसभा: संगठित गांव की शक्ति

    16 जनवरी 2023 को उरमापाल के 7 टोले एकजुट होकर एक संयुक्त महा ग्रामसभा में शामिल हुए। इस सभा में जिला कलेक्टर, वन विभाग, आदिवासी विकास विभाग और DFO को सूचना दी गई।
    इस महाअभियान में संस्थाओं, समुदायों और युवाओं की भागीदारी ने एक संगठित आवाज़ बनाई — “हमें हमारा जंगल चाहिए, अधिकार सहित।”


    अधिकार की जीत: 1303.643 हेक्टेयर जंगल पर सामुदायिक नियंत्रण

    लगभग तीन वर्षों के संघर्ष और लगातार दस्तावेजी प्रयासों के बाद, 9 अगस्त 2023 (विश्व आदिवासी दिवस) को उरमापाल को 1303.643 हेक्टेयर जंगल पर CFRR का अधिकार पत्र प्राप्त हुआ।

    यह केवल एक कागज़ नहीं, बल्कि:

    • जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय स्वामित्व का प्रमाण है
    • गांव की आजादी, आजीविका और आत्मनिर्भरता का औजार है
    • संरक्षण और सतत विकास का मार्ग है

    ग्रामसभा की भूमिका: अधिकार के बाद जिम्मेदारी

    अधिकार पत्र प्राप्त होने के बाद उरमापाल की ग्रामसभा ने तत्परता से वन प्रबंधन की दिशा में कदम उठाए:

    • वन में आग लगाने पर पूर्ण प्रतिबंध
    • वन कटाई पर नियंत्रण
    • वृक्षारोपण की व्यापक योजना
    • विभिन्न विभागों को योजनाओं की जानकारी हेतु आमंत्रण

    इससे साफ है कि यह अधिकार केवल “उपयोग” नहीं बल्कि “प्रबंधन, संरक्षण और भविष्य निर्माण” का माध्यम बन गया है।


    कहानी से सीख: अधिकार आंदोलन से बनते हैं

    उरमापाल की यह यात्रा बताती है:

    “जब समुदाय जागता है, तो जंगल भी सांस लेते हैं।“

    यह सिर्फ एक ग्राम की जीत नहीं — यह पूरे बस्तर क्षेत्र के लिए एक उदाहरण, एक मॉडल और एक प्रेरणा है।

    CFRR जैसे अधिकारों की लड़ाई केवल कानून से नहीं — समझ, संगठन और सतत प्रयासों से जीती जाती है।


    जंगल के अधिकार से उगती है आत्मनिर्भरता की रोशनी

    उरमापाल की कहानी यह दिखाती है कि अधिकार प्राप्त कर लेने के बाद असली कार्य शुरू होता है — जंगल को बचाना, आजीविका को संवारना और संस्कृति को संरक्षित रखना।

    CFRR आज केवल एक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह आदिवासी पहचान, आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ सहजीवन का प्रतीक है।

    CFR
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