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    महिला सशक्तिकरण

    सामुदायिक वन संसाधन से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता ग्राम भुरभूसी

    vikasBy vikasOctober 17, 2025No Comments4 Mins Read11 Views
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    छत्तीसगढ़ के नवगठित मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के दुर्गम वनांचल में स्थित ग्राम भुरभूसी आज सामुदायिक वन संसाधन के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में एक नई मिसाल कायम कर रहा है। विकासखंड मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर और जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर बसा यह गांव, शिवनाथ नदी के तट पर अपनी विशिष्ट भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान रखता है। चारों ओर से जल से घिरा यह क्षेत्र लंबे समय तक बाहरी दुनिया से कटा रहा, लेकिन आज यही गांव अपनी एकजुटता, जागरूकता और संगठित प्रयासों से विकास की राह पर अग्रसर है।


    इतिहास और विस्थापन की कहानी

    वर्ष 2005 में जब शिवनाथ नदी पर मोंगरा बैराज का निर्माण हुआ, तब ग्राम भुरभूसी डूबान क्षेत्र में आ गया। उस समय गांव में लगभग 60 आदिवासी गोंड जनजाति के परिवार निवास करते थे। शासन द्वारा नियम अनुसार उन्हें मुआवजा तो मिला, लेकिन अधिकांश परिवारों को अपने पैतृक निवास और भूमि से विस्थापित होना पड़ा। वर्तमान में केवल 17 परिवार गांव के ऊपरी हिस्से में स्थायी रूप से बस पाए, जबकि शेष परिवारों को अन्य गांवों में शरण लेनी पड़ी।

    जलमग्न भूमि के कारण इन परिवारों ने वन भूमि पर झोपड़ियां बनाकर जीवनयापन शुरू किया। वन विभाग द्वारा बार-बार हटाने के प्रयासों और सीमित आजीविका विकल्पों के बावजूद, गांव के लोग आसपास के गांवों में मजदूरी और वन उपज जैसे महुआ, चिरौंजी, और मछली पकड़कर अपना गुजर-बसर करते रहे। गांव की मातृभाषा गोंडी है, और आज भी यहां की संस्कृति और परंपराएं गहराई से इस भाषा में रची-बसी हैं।


    संस्था का हस्तक्षेप और वन अधिकार अधिनियम की प्रक्रिया

    वर्ष 2013 में सृष्टि संस्था ने इस क्षेत्र में वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006, नियम 2008 एवं संशोधित अधिनियम 2012 के तहत कार्य शुरू किया। जब संस्था ने भुरभूसी में बेसलाइन सर्वे किया, तो यह सामने आया कि न तो किसी परिवार को व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र मिला था, न ही ग्राम सभा को सामुदायिक अधिकार प्राप्त था।

    संस्था द्वारा लगातार ग्राम बैठकों और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीणों को उनके संवैधानिक अधिकारों की जानकारी दी गई। इसके परिणामस्वरूप, 9 परिवारों को व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) प्राप्त हुआ। साथ ही यह भी पाया गया कि वन विभाग की संयुक्त वन प्रबंधन समिति (JFMC) की सूची से भुरभूसी गांव का नाम हटा दिया गया था। संस्था के सहयोग से ग्रामीणों ने कानूनी प्रक्रिया अपनाई, समिति का पुनर्गठन किया और उसका बैंक खाता भी खुलवाया। परिणामस्वरूप, वन विभाग के 10 वर्षीय वर्किंग प्लान के तहत गांव के वन क्षेत्र में कटाई पर रोक लगी — यह ग्रामीण जागरूकता की एक बड़ी उपलब्धि थी।


    सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR) की प्राप्ति

    संस्था और ग्रामसभा के संयुक्त प्रयासों से वर्ष 2021-22 में ग्राम भुरभूसी को 129.763 हेक्टेयर वन क्षेत्र पर सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR) प्राप्त हुआ।
    यह उपलब्धि न केवल कानूनी मान्यता थी, बल्कि गांव के आत्मसम्मान और स्वशासन की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हुई।

    ग्रामसभा ने इसके बाद आवास पट्टे के लिए भी जिला प्रशासन एवं विधायक को आवेदन प्रस्तुत किया। निरंतर प्रयासों के बाद, वर्ष 2022-23 में गांव के सभी परिवारों को आवासीय पट्टे प्राप्त हुए। इससे ग्रामीणों में स्थायित्व और सुरक्षा की भावना मजबूत हुई।


    आजीविका आधारित पहल और आर्थिक सशक्तिकरण

    CFRR प्राप्ति के बाद ग्रामसभा ने संस्था के मार्गदर्शन में महुआ फूल बैंक की स्थापना की। इस बैंक में अब तक 75 किलोग्राम महुआ फूल जमा किए गए हैं, जिनका बाजार मूल्य लगभग ₹50 प्रति किलो है।
    साथ ही, ग्रामसभा ने सीताफल खरीदी-बिक्री की प्रक्रिया को सामुदायिक स्तर पर संगठित किया है, जिससे ग्रामीणों को प्रतिवर्ष अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।

    इसके अलावा, संयुक्त वन प्रबंधन समिति को कैम्पा निधि से ₹3.40 लाख की राशि प्राप्त हुई है, जिसे गांव के विकास और संसाधन प्रबंधन में उपयोग किया जा रहा है।


    ग्राम भुरभूसी की उपलब्धियाँ

    • संयुक्त वन प्रबंधन समिति का गठन और पारंपरिक वन सीमा की पुनः मान्यता।
    • समिति के नाम से बैंक खाता और कैम्पा निधि से ₹3.40 लाख की स्वीकृति।
    • CFRR और IFR दोनों अधिकारों की प्राप्ति।
    • सभी परिवारों को आवासीय पट्टा उपलब्ध।
    • सीताफल खरीदी-बिक्री का नियमित व्यवसाय।
    • महुआ फूल बैंक की स्थापना और प्रबंधन।

    जागरूकता से आत्मनिर्भरता की ओर

    ग्राम भुरभूसी की यह कहानी यह सिखाती है कि जागरूकता, एकजुटता और निरंतर प्रयास से कोई भी समुदाय अपनी कठिन परिस्थितियों को अवसरों में बदल सकता है।
    वन अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन, संस्थागत सहयोग और ग्रामसभा की सशक्त भूमिका ने यह सिद्ध किया है कि जब समुदाय अपने संसाधनों पर अधिकार और जिम्मेदारी दोनों निभाता है, तो आत्मनिर्भरता केवल सपना नहीं, वास्तविकता बन जाती है।

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