
— मधु राजगोड़, ग्राम चटौद, ब्लॉक आरंग, जिला रायपुर
“मैं भी कभी झाड़-फूंक को ही इलाज मानती थी…”
मैं मधु राजगोड़ हूँ, राजगोड़ पारा की रहने वाली। हमारे पारा में लगभग 30 परिवार रहते हैं। सालों से हम सब पारंपरिक तरीकों से ही बीमारियों का इलाज करते थे — कोई बुखार हो, कोई तकलीफ हो, तो झाड़-फूंक या घर की दवाई। डॉक्टर या अस्पताल जाना तो जैसे हमारे लिए कभी विकल्प ही नहीं था।
“जब मैंने वीएचएसएनसी की बैठक में जाना शुरू किया…”
सच बताऊँ, जब मुझे 2022 में ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण समिति (VHSNC) में जोड़ा गया, तब तक मैं भी यही सोचती थी कि झाड़-फूंक ही सही तरीका है। लेकिन जब मैंने दूसरी महिलाओं के साथ बैठकों में जाना शुरू किया, तो वहाँ देखा कि कैसे छोटी-बड़ी समस्याओं का हल डॉक्टर और दवाइयों से होता है। मुझे समझ आने लगा कि हमने तो खुद को ही पीछे रखा है।
“एक लड़की की मौत ने मेरी सोच को झकझोर दिया…”
दिसंबर 2021 की बात है, हमारे ही पारा में एक किशोरी की कम उम्र में शादी हुई थी और जल्दी ही वो गर्भवती भी हो गई। सही इलाज ना मिलने और समय पर ध्यान न देने की वजह से उसकी मौत हो गई। उस दिन मेरे अंदर कुछ बदल गया। मैंने सोचा — अगर हमने पहले ही उसे अस्पताल पहुँचाया होता, तो शायद उसकी जान बच जाती।
“फिर मैंने ठान लिया…”
मैंने तय कर लिया कि अब अपने पारा के लोगों की सोच बदलनी है। शुरू में लोगों ने मेरी बात नहीं मानी — बोले, “तू भी अब बाहर वालों जैसी हो गई है?” लेकिन मैं रुकी नहीं। मैंने महिलाओं से बात की, पुरुषों को समझाया कि हर बार झाड़-फूंक से ठीक नहीं होता। VHSNC और स्वास्थ्य विभाग की मदद से हमने एक शिविर भी लगाया — जिसमें कुछ लोग झिझकते हुए आए।
“पहले कुछ ही आए, फिर सब आने लगे…”
जो लोग पहली बार शिविर में आए, उन्हें अच्छा इलाज मिला। फिर धीरे-धीरे दूसरे लोग भी आने लगे। अब हालत ये है कि 30 में से 28 परिवार नियमित रूप से स्वास्थ्य केंद्र जाते हैं। गर्भवती महिलाएं अब टीका लगवाती हैं, समय-समय पर जांच करवाती हैं, और अस्पताल में सुरक्षित प्रसव करवा रही हैं।
“अब मैं गर्व से कहती हूँ…”
मुझे बहुत गर्व है कि मेरे प्रयासों से आज हमारा पारा स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ चुका है। लोग अब बिना डर के डॉक्टर के पास जाते हैं, दवाइयाँ लेते हैं, और समय रहते इलाज करवाते हैं। सबसे बड़ी बात — अब अंधविश्वास धीरे-धीरे कम हो रहा है।
“मैं तो बस यही कहती हूँ – अगर हम खुद आगे नहीं आएँगे, तो बदलाव नहीं आएगा। जब अपने लोग समझाएँगे, तभी लोग सुनेंगे। और मैं तो बस यही कर रही हूँ — अपने लोगों से, अपने दिल से बात।”
— मधु राजगोड़
