
स्थान: ग्राम कोयाइटपाल, ग्राम पंचायत पिद्दा कोड़ापाल, जनपद पंचायत बीजापुर, जिला बीजापुर (छत्तीसगढ़)
ग्राम की पहचान: जंगल से जुड़ी आत्मा
दक्षिण बस्तर के अंतिम छोर पर बसा ग्राम कोयाइटपाल न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि इसकी आत्मा जंगलों में रची-बसी है। लगभग 200 वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में जब जनजाजिय समुदाय के आलम और लेकाम गोत्र के लोगों ने आकर बसाहट की, तो उन्होंने यहां की जल, जंगल और जमीन की समृद्धता को देखते हुए गांव बसाने का निर्णय लिया। नार्र पेन और बुमयायो की पारंपरिक मान्यता के अनुसार गांव की सीमाएं तय की गईं, जो आज भी मान्य हैं। यहां के निवासी आज भी अपने जीवन के हर पहलू में वनों पर निर्भर हैं — चाहे वह वनोपज हो, कृषि हो या सांस्कृतिक पहचान।
जागरूकता का आरंभ: कानूनी अधिकार की पहली सीढ़ी
जब जिले के कुछ अन्य गांवों को सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्राप्त हुआ, तब कोयाइटपाल के लोगों में भी यह चर्चा शुरू हुई कि क्या यह उनका भी अधिकार हो सकता है। एफईएस जैसे संगठनों ने समुदाय के गोयता, पटेल और वन अधिकार समिति के सदस्यों को प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया, लेकिन जानकारी की कमी और कानून की जटिलता के कारण लोग इस प्रक्रिया से जुड़ने में हिचक रहे थे। ग्रामीणों को यह लगता था कि वे पहले से ही वनों का उपयोग कर रहे हैं, तो इस प्रक्रिया की क्या आवश्यकता है। ऐसे में गांव में बार-बार बैठकों का आयोजन हुआ, जहां उन्हें बताया गया कि यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि उनका संवैधानिक और कानूनी अधिकार है, जो उन्हें वन प्रबंधन में निर्णायक भूमिका देता है।
दस्तावेज़ी प्रक्रिया की चुनौतियां: धैर्य और प्रयास की परीक्षा
दावा प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए गांव में विशेष ग्रामसभाएं आयोजित की गईं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कई अड़चनें सामने आईं। सीमावर्ती गांवों के साथ सीमा विवाद, वन मानचित्रों की अनुपलब्धता, तकनीकी टीमों की गैर-हाजिरी और विभागीय समन्वय की कमी ने पूरी प्रक्रिया को जटिल बना दिया। GPS मैपिंग जैसे कार्यों के लिए वन विभाग और पटवारी को बुलाया गया, लेकिन वे कई बार अनुपस्थित रहे, जिससे प्रक्रिया बार-बार टलती रही। इन चुनौतियों के बावजूद गांववालों ने हार नहीं मानी और उपखंड स्तर पर अधिकारियों से लिखित शिकायतें कर आवश्यक दबाव बनाया। पूर्वजों द्वारा स्थापित सीमाचिन्हों का उपयोग करते हुए सीमांकन को स्पष्ट किया गया और दस्तावेज तैयार किए गए।
सामूहिक नेतृत्व और सतत फॉलोअप: सफलता की चाबी
ग्रामसभा और वन अधिकार समिति ने मिलकर नेतृत्व की जिम्मेदारी उठाई। सचिव और सरपंच की सहायता से ग्रामसभाएं नियमित रूप से बुलाई गईं और दावा पत्र की तैयारी में स्थानीय स्तर पर ठोस प्रयास किए गए। जब उपखंड समिति में दावा प्रस्तुत किया गया, तब भी विभागीय प्रक्रिया को गति देने के लिए लगातार फॉलोअप किया गया। कई बार अधिकारियों से मुलाकात कर दस्तावेजों की समीक्षा करवाई गई और यह सुनिश्चित किया गया कि ग्रामसभा का दावा अटक न जाए। यह लगातार प्रयासों का ही परिणाम था कि लगभग 8 महीनों की प्रक्रिया के बाद वर्ष 2024 में ग्रामसभा को 2287.984 हेक्टेयर वन भूमि पर सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्रदान किया गया।
अधिकार मिलने के बाद: स्वशासन की नई दिशा
सामुदायिक वन अधिकार मिलने के पश्चात ग्रामसभा ने त्वरित निर्णय लेते हुए कई प्रबंधनात्मक कदम उठाए। अवैध कटाई और अतिक्रमण पर रोक लगाने के लिए वन निगरानी समिति का गठन किया गया। वन क्षेत्र में आगजनी की घटनाओं को रोकने हेतु सामूहिक पहरेदारी की जा रही है। वनोपज के संग्रहण और उपयोग की एक व्यवस्थित प्रक्रिया तैयार की गई है, जिससे संसाधनों का संतुलित दोहन संभव हो सके। ग्रामसभा की निर्णय प्रक्रिया पहले से अधिक सशक्त हुई है, और बाहरी लोगों द्वारा जंगल के अंधाधुंध दोहन पर लगभग पूरी तरह से रोक लगाई जा चुकी है। इससे न केवल समुदाय में आत्मसम्मान की भावना प्रबल हुई है, बल्कि स्थानीय स्तर पर स्वशासन की मजबूत नींव भी रखी गई है।
आत्मनिर्भरता और अधिकार का संगम
कोयाइटपाल की यह संघर्षगाथा यह सिद्ध करती है कि जब ग्रामीण समुदाय संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए खड़ा होता है, तो वे न केवल अपने परंपरागत हकों की रक्षा कर सकते हैं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर विकास की ओर भी बढ़ सकते हैं। यह कहानी अन्य वनों में बसे समुदायों के लिए एक प्रेरक उदाहरण है — कि “हमें सिर्फ जंगल से प्यार नहीं है, बल्कि उसके संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार भी हमारा है।”
