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    स्वराज मंथन

    कोयाइटपाल: जंगल की गोद से उठी अधिकार की आवाज़

    vikasBy vikasJuly 3, 2025Updated:August 27, 2025No Comments4 Mins Read3 Views
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    एक आदिवासी गांव की सामूहिक चेतना और संघर्ष की प्रेरक कहानी
    ग्राम: कोयाइटपाल | जिला: बीजापुर, छत्तीसगढ़

    छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में, जहां रास्ते भी पेड़ों की सरसराहट से बनते हैं और जहां हर पेड़, हर पत्थर अपने भीतर एक कथा समेटे है — वहीं बसा है कोयाइटपाल। यह कोई आम गांव नहीं, बल्कि एक आदिवासी समुदाय की जिजीविषा, परंपरा और प्रकृति से प्रेम की जीवंत मिसाल है।

    लेकिन यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं है — यह है अपने अधिकारों की पहचान, जागरूकता और संघर्ष की वह कहानी, जिसने कोयाइटपाल को पूरे दक्षिण बस्तर में एक आदर्श बना दिया।


    जहां जंगल ही जीवन है

    कोयाइटपाल का इतिहास करीब 200 वर्षों से भी पुराना है। कभी इस गांव को बीजपड़ कहा जाता था, पर जब कोया जनजाति ने यहां स्थायी रूप से निवास करना शुरू किया, तब इसका नाम बदलकर कोयाइटपाल रखा गया।

    गांव की बुनियाद जल, जंगल और जमीन पर टिकी है। यहां के लोग अब भी अपने पूर्वजों द्वारा तय की गई नार्र पेन व्यवस्था का पालन करते हैं, जिसमें जंगल को देवी की तरह पूजा जाता है और हर उपयोग से पहले उसका आभार व्यक्त किया जाता है।


    जब गांव को पता चला — “यह हमारा हक़ है”

    2019 के बाद जब आसपास के गांवों को सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) मिलने लगे, तब कोयाइटपाल में भी कानूनी जागरूकता की लहर उठी।

    संगठनों की मदद से प्रशिक्षण शुरू हुआ। गोयता, पटेल और वन अधिकार समिति के सदस्य CFR की प्रक्रिया समझने लगे। लेकिन असली चुनौती थी – पूरे गांव को इस प्रक्रिया से जोड़ना।

    गांववालों के लिए यह नया कानून था। “जब हमें जंगल से सब कुछ मिल ही रहा है, तो इस कानून की क्या ज़रूरत?” — यह सवाल अक्सर उठता।

    फिर एक के बाद एक बैठकें हुईं। समझाया गया कि यह केवल सुविधा नहीं, कानूनी अधिकार और भविष्य की सुरक्षा है।


    कदम-कदम पर अड़चनें, लेकिन पीछे हटना नहीं सीखा

    जब गांव ने औपचारिक रूप से CFR का दावा करना शुरू किया, तब असली परीक्षा शुरू हुई।

    • नक्शों की अनुपलब्धता
    • सीमावर्ती गांवों से विवाद
    • सचिवों की गैरहाजिरी
    • GPS मैपिंग में देरी
    • उपखंड कार्यालयों के बार-बार चक्कर

    गांव ने हार नहीं मानी। पारंपरिक सीमाओं के पत्थरों और बुजुर्गों की याददाश्त ने मार्ग दिखाया। सचिव, सरपंच और संगठनों के सहयोग से सीमाएं तय हुईं। लगातार 8 महीने की मेहनत के बाद, ग्रामसभा ने अपने दावे उपखंड समिति में प्रस्तुत किए।


    2024: जब जंगल ने गांव को फिर से अपनाया

    लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 2024 में कोयाइटपाल ग्रामसभा को 2287.984 हेक्टेयर जंगल पर सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मिला।

    यह सिर्फ एक सरकारी पत्र नहीं था। यह था — गांव का प्रकृति से टूटा रिश्ता फिर से जोड़ने वाला सेतु।


    अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी निभाई गई

    ग्रामसभा ने अधिकार मिलते ही कार्य आरंभ कर दिए:

    • वन निगरानी दल बनाया गया
    • अवैध कटाई और अतिक्रमण पर रोक लगाई गई
    • आगजनी से बचाव के लिए सामूहिक पहरे
    • वनोपज का सुनियोजित संकलन शुरू
    • बाहरी दोहन पर लगभग पूरी तरह से नियंत्रण
    • स्थायी वन प्रबंधन योजना तैयार की जा रही है

    और सबसे महत्वपूर्ण — गांव में सामूहिकता, आत्मसम्मान और निर्णय लेने की क्षमता का विकास हुआ।


    एक गांव से शुरू हुआ, बदलाव की लहर बन गया

    कोयाइटपाल की यह कहानी बताती है कि जब कोई समुदाय अपने पूर्वजों की परंपरा, अपने जंगल और अपने हकों को पहचानकर एकजुट होता है, तो वह केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं पाता — वह अपना अस्तित्व पुनः स्थापित करता है।

    यह सिर्फ अधिकार की कहानी नहीं है — यह सम्मान, नेतृत्व, और साझा भविष्य की कहानी है।


    क्या आप सुन पा रहे हैं जंगल की वो आवाज़, जो कह रही है — “अब हम अपने हैं”?

    CFRR Chhattisgarh Forest Tribal
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