छत्तीसगढ़, भारत का एक खनिज संपन्न राज्य, अपने समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है। हालांकि, राज्य के कुछ हिस्सों में भूजल में फ्लोराइड की उच्च सांद्रता पाई गई है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है। फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा दंत और कंकाल फ्लोरोसिस जैसी बीमारियों का कारण बन सकती है।
छत्तीसगढ़ में फ्लोराइड की स्थिति
हाल ही में किए गए एक अखिल भारतीय विश्लेषण में, छत्तीसगढ़ उन राज्यों में शामिल है जहां भूजल में फ्लोराइड का अत्यधिक स्तर पाया गया है। यह विश्लेषण 6.66 लाख अवलोकनों पर आधारित था, जिसमें पाया गया कि मानसून से पहले शुष्क गर्मियों के महीनों में फ्लोराइड संदूषण अनुमेय सीमा से 8.65% अधिक होता है, जबकि मानसून के बाद के महीनों में यह सामान्य से 7.1% अधिक होता है। पीने के पानी में फ्लोराइड की अनुमेय सीमा 1.50 मिलीग्राम/लीटर है; इससे ऊपर का स्तर पीने के लिए अनुपयुक्त माना जाता है।
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स्वास्थ्य पर प्रभाव
फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य पर विभिन्न दुष्प्रभाव डालती है। प्रमुख प्रभाव इस प्रकार हैं:
- दंत फ्लोरोसिस (Dental Fluorosis):
- फ्लोराइड की मात्रा 1.5 से 3.0 मिलीग्राम/लीटर होने पर दंत फ्लोरोसिस की संभावना बढ़ जाती है, जिससे दांतों पर सफेद या भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। hindi.indiawaterportal.org
- कंकाल फ्लोरोसिस (Skeletal Fluorosis):
- फ्लोराइड की मात्रा 3.0 से 10 मिलीग्राम/लीटर होने पर अस्थि फ्लोरोसिस विकसित हो सकता है, जिससे हड्डियाँ कठोर और कमजोर हो जाती हैं, जोड़ों में दर्द और अकड़न होती है। hindi.indiawaterportal.org
- अन्य स्वास्थ्य प्रभाव:
- फ्लोराइड की उच्च मात्रा (10 मिलीग्राम/लीटर से अधिक) पंगु अस्थि-फ्लोरोसिस और अस्थिजड़ता का कारण बन सकती है। hindi.indiawaterportal.org
फ्लोराइड प्रदूषण रोकने के उपाय
- पेयजल प्रबंधन:
- प्रभावित क्षेत्रों में रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) या डिफ्लोरीडेशन यूनिट्स का उपयोग करके पेयजल से फ्लोराइड की मात्रा कम की जा सकती है।
- सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र स्थापित करना एक प्रभावी कदम हो सकता है।
- जागरूकता अभियान:
- स्थानीय समुदायों को फ्लोराइड के दुष्प्रभावों और बचाव के तरीकों के बारे में शिक्षित करना आवश्यक है।
- स्कूलों और पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करके जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
- भूजल प्रबंधन:
- बोरवेल और गहरे जल स्रोतों की नियमित जाँच और निगरानी आवश्यक है।
- भूजल पुनर्भरण तकनीकों, जैसे वर्षा जल संचयन, को अपनाकर भूजल की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
