
जलभृत मानचित्रण एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो भूजल की मात्रा, गुणवत्ता और गति को सही ढंग से चित्रित करने के लिए विभिन्न भौतिक और वैज्ञानिक विधियों का संयोजन करती है। यह जलभृत का सही मूल्यांकन और इसके बेहतर प्रबंधन के लिए आवश्यक होता है, जिससे स्थानीय स्तर पर जल संसाधनों का सतत और समानुपातिक प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके। पिछले कुछ वर्षों में भूजल के संतुलित प्रबंधन की आवश्यकता बढ़ी है, जिसके चलते जलभृत मानचित्रण का महत्व और बढ़ गया है।
अध्ययन क्षेत्र: यह अध्ययन दुर्ग जिले के तीन विकासखंडों – धमधा, दुर्ग, और पाटन – के 2506 वर्ग किमी क्षेत्र में किया गया। दुर्ग जिला छत्तीसगढ़ राज्य के पश्चिमी भाग में स्थित है और यह 20.90ºN से 21.50ºN अक्षांश और 81.16ºE से 81.6ºE देशांतर के बीच विस्तृत है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जिले की जनसंख्या 17,21,726 है, जिसमें 6,17,184 ग्रामीण और 11,04,542 शहरी लोग हैं।
जलवायु और वर्षा: अध्ययन क्षेत्र में उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु है। 2011-2015 के दौरान, यहां की औसत वार्षिक वर्षा 1217.33 मिमी रही, जिसमें से लगभग 92% मानसून के दौरान होती है।
भूगोल और भूविज्ञान: अध्ययन क्षेत्र में संरचनात्मक मैदान, बाढ़ के मैदान और पेडिमेंट/पेडीप्लेन शामिल हैं, जिनकी ऊंचाई 241 मीटर से 470 मीटर तक है। प्रमुख जलभृतों में तारेंगा शेल, चांदी चूना पत्थर, चांदी बलुआ पत्थर और गुंडरदेही शेल शामिल हैं।
कृषि और सिंचाई: जिले में कुल बोया गया क्षेत्र 147,146 हेक्टेयर है, जिसमें से 43,291 हेक्टेयर दोहरी फसल वाला क्षेत्र है। कुल सिंचित क्षेत्र 93,215 हेक्टेयर है, जिसमें से 62.12% सतही जल से और 30.41% भूजल से सिंचित है। यह दर्शाता है कि भूजल सिंचाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जलभृत मानचित्रण के निष्कर्ष:
प्री-मानसून अवधि में, तारेंगा शेल में जल स्तर 3.9 मीटर से 10.8 मीटर के बीच देखा गया।
पोस्ट-मानसून अवधि में, चांदी चूना पत्थर में जल स्तर 0.84 मीटर से 3.57 मीटर के बीच पाया गया।
जल स्तर में मौसमी उतार-चढ़ाव देखा गया, जिसमें कुछ क्षेत्रों में जल स्तर 5 मीटर से अधिक गहरा हो गया।
प्रबंधन रणनीतियाँ:
कृत्रिम पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण: जलवायु परिवर्तन और मानसून की अनिश्चितता को देखते हुए कृत्रिम पुनर्भरण संरचनाओं की आवश्यकता है ताकि जल स्तर बनाए रखा जा सके।
मौजूदा टैंकों और तालाबों का पुनर्संरक्षण: पुराने जल संचयन टैंकों और तालाबों का पुनः निर्माण और सुधार करना।
वर्षा जल संचयन संरचनाओं का निर्माण: वर्षा जल संचयन तकनीकों को बढ़ावा देना ताकि जल संकट को कम किया जा सके।
किसानों को सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन: किसानों को रबी मौसम में मक्का/बाजरा की खेती करने और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
प्रभावित गांवों में छोटे निस्पंदन इकाइयों की स्थापना: छोटे स्तर पर जल शुद्धिकरण इकाइयों की स्थापना की आवश्यकता है, ताकि जल गुणवत्ता में सुधार हो सके।
दुर्ग जिले में भूजल संसाधनों का सतत और समानुपातिक प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए उपरोक्त प्रबंधन रणनीतियों का कार्यान्वयन आवश्यक है। जलभृत मानचित्रण से प्राप्त डेटा का उपयोग करके भूजल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है, जिससे कृषि, पीने के पानी और अन्य जल-आधारित गतिविधियों में संतुलन बनाए रखा जा सके। यह दृष्टिकोण जिले में जल संकट के समाधान के लिए सहायक साबित होगा।