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    जल मंथन

    दुर्ग जिले में भू-जल संकट

    vikasBy vikasFebruary 13, 2025Updated:February 14, 2025No Comments3 Mins Read3 Views
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    छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यहाँ कुएँ और तालाब हमेशा पानी से लबालब भरे रहते थे। खेतों में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध था, और गर्मी के दिनों में भी लोग पानी की किल्लत महसूस नहीं करते थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, गाँव की जल संकट की कहानी भी बदल गई।

    समस्या की शुरुआत
    पिछले दो दशकों में, बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और अनियंत्रित बोरवेल खुदाई के कारण भू-जल स्तर तेजी से गिरने लगा। पहले जहाँ 30-40 फीट की खुदाई करने पर पानी मिल जाता था, अब वही पानी 250-300 फीट की गहराई में चला गया है। गाँव के किसान बताते हैं, “हमारे दादा के समय में कुएँ खुदे रहते थे, और नदियाँ सालभर बहती थीं। लेकिन अब बोरिंग मशीन के बिना पानी मिलना असंभव हो गया है।”

    जल संकट का प्रभाव
    भू-जल स्तर में गिरावट का सबसे अधिक प्रभाव गाँव के किसानों पर पड़ा। पानी की कमी के कारण फसल उत्पादन में भारी गिरावट आई। पहले तीन फसलें लेने वाले किसान अब मुश्किल से एक फसल उगा पा रहे हैं। पशुपालन भी प्रभावित हुआ, क्योंकि मवेशियों के लिए पर्याप्त पानी नहीं बचा।

    गाँव की महिलाओं को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पहले जो पानी पास के कुएँ या तालाब से मिल जाता था, अब उन्हें पानी लाने के लिए दो-तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। “सुबह चार बजे उठकर पानी भरने जाना हमारी मजबूरी बन गई है,” गाँव की महिला ने कहा।

    सरकारी रिपोर्ट और आंकड़े
    केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट के अनुसार, दुर्ग जिले में भूजल स्तर औसतन 3-5 मीटर प्रति वर्ष की दर से गिर रहा है। 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, जिले के कई गाँव “डार्क ज़ोन” की श्रेणी में आ चुके हैं, जिसका अर्थ है कि वहाँ भूजल पुनर्भरण की दर बहुत कम हो चुकी है।

    समाधान की दिशा में कदम
    जब स्थिति बिगड़ने लगी, तो गाँव के लोगों ने जल संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने का निर्णय लिया। उन्होंने पंचायत के साथ मिलकर कई जल संरक्षण योजनाएँ शुरू कीं, जिनमें प्रमुख थे:

    रूफटॉप वर्षा जल संचयन: कई घरों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था की गई, जिससे भूजल पुनर्भरण में मदद मिली।
    परंपरागत जल स्रोतों का पुनरुद्धार: गाँव के पुराने तालाबों की सफाई की गई और उन्हें गहरा किया गया, जिससे बरसात का पानी इन जलाशयों में एकत्र हो सके।
    सामुदायिक जागरूकता अभियान: स्कूलों और पंचायत भवन में जल संरक्षण पर कार्यशालाएँ आयोजित की गईं, जिससे गाँव के लोग पानी बचाने के लिए जागरूक हो सकें।
    परिणाम और आशा की किरण
    तीन साल की मेहनत के बाद गाँव में सकारात्मक बदलाव दिखने लगे। जल संरक्षण के प्रयासों से भू-जल स्तर में मामूली वृद्धि देखी गई। गर्मियों में भी कुछ कुएँ पानी देने लगे, और किसान पुनः दो फसलें उगाने में सक्षम हो गए। गाँव की सरपंच सुमित्रा देवी कहती हैं, “अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए पानी बचाना चाहते हैं, तो हमें सतत प्रयास करने होंगे।”

    सीख और आगे की राह
    दुर्ग जिले के गाँव की यह कहानी हमें सिखाती है कि यदि समय रहते जल संरक्षण के उपाय किए जाएँ, तो संकट को टाला जा सकता है। यह केवल सूर्या गाँव की नहीं, बल्कि पूरे देश के उन हजारों गाँवों की कहानी है जो जल संकट का सामना कर रहे हैं। जरूरत है कि हम सभी जल संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बनाएँ और सतत प्रयास करें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी जल संकट से बच सकें।

    “बूँद-बूँद पानी की कीमत तब समझ में आती है, जब कुएँ सूख जाते हैं।”

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