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    छत्तीसगढ़

    गोटुल : बस्तर की सांस्कृतिक धड़कन और मुरिया युवाओं का विश्वविद्यालय

    vikasBy vikasAugust 23, 2025Updated:August 23, 2025No Comments3 Mins Read14 Views
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    परिचय : गोटुल क्या है?
    बस्तर अंचल की मुरिया जनजाति की संस्कृति में गोटुल केवल एक भवन नहीं, बल्कि युवाओं का सांस्कृतिक केंद्र और संगठन है। यहाँ अविवाहित युवक और युवतियां सदस्य बनते हैं। युवक को चेलिक और युवती को मोटियारी कहा जाता है। गोटुल की यह परंपरा न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि अनुशासन, संस्कृति और सामूहिक जीवन की शिक्षा भी देती है।

    गोटुल की सदस्यता और अनुशासन
    गोटुल में सदस्यता केवल अविवाहित युवाओं को दी जाती है। चेलिकों का नेतृत्व सिरेदार करता है और मोटियारिनों का नेतृत्व बेलोसा के हाथों में होता है। गोटुल की व्यवस्था चलाने के लिए एक समिति गठित होती है, जिसमें अलग-अलग पदनाम, अधिकार और जिम्मेदारियां दी जाती हैं। गोटुल में अनुशासन का कड़ाई से पालन होता है और नियमों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है। विवाह के बाद सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है, क्योंकि गोटुल केवल अविवाहित युवाओं का संगठन माना जाता है।

    गोटुल का स्वरूप और निर्माण शैली
    गोटुल प्रायः गाँव के बीचोंबीच बनाया जाता है। इसका निर्माण लकड़ी, मिट्टी और घास से होता है। यह लकड़ी के खंभों पर टिकी हुई खपरैल या घास की छत से बना माण्डा जैसा होता है। गोटुल को घेरने के लिए छह से सात फुट ऊँची लकड़ी की बाड़ बनाई जाती है। सामने लंबा और समतल आंगन होता है, जिसमें गोटुल खाम्ब गाड़ा जाता है। गोटुल खाम्ब को सजाने के लिए लालटेन रखे जाते हैं। यही वह जगह है, जहाँ युवक-युवतियां पारंपरिक गीत और वाद्ययंत्रों के साथ नृत्य करते हैं।

    नक्काशी और कलात्मक अभिव्यक्ति
    गोटुल केवल भवन नहीं है, बल्कि कला और सौंदर्यप्रियता का प्रतीक भी है। इसके खंभों और दीवारों पर पशु-पक्षियों, युवक-युवतियों, तीर-धनुष और बेल-बूटों की नक्काशी की जाती है। आड़ी-तिरछी और टेढ़ी रेखाओं से बनाई गई आकृतियाँ मुरिया कला की विशिष्टता दर्शाती हैं। गोटुल खाम्ब पर चिड़िया, गाय-बैल, जंगली जानवर और ज्यामितीय डिज़ाइन उकेरे जाते हैं, जो मुरिया जनजाति के प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दिखाते हैं। यह नक्काशी मुरिया काष्ठ कला की उत्कृष्ट और बेजोड़ कृतियों में गिनी जाती है।

    गोटुल के नियम और परंपराएँ
    गोटुल केवल मनोरंजन का स्थान नहीं है, बल्कि यह अनुशासन और सामाजिक व्यवहार का विद्यालय भी है। यहाँ प्रत्येक सदस्य के लिए नियम तय होते हैं।

    • गोटुल में समय पर उपस्थित होना और सामूहिक गतिविधियों में भाग लेना अनिवार्य होता है।
    • वरिष्ठ चेलिक और मोटियारिन अनुशासन का पालन करवाते हैं और नियम तोड़ने वालों को दंड देते हैं।
    • गोटुल में पारंपरिक नृत्य, गीत, वाद्ययंत्र वादन और सामाजिक कार्यों का अभ्यास कराया जाता है।
    • यह युवाओं के लिए विवाह पूर्व जीवन, सामाजिक जिम्मेदारियों और परंपराओं की शिक्षा का केंद्र होता है।
    • अनुशासनहीनता जैसे झगड़ा करना, अशिष्ट व्यवहार करना या सामूहिक गतिविधियों से अनुपस्थित रहना दंडनीय होता है।

    इन परंपराओं से युवाओं में आपसी सहयोग, सामूहिकता और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।

    गोटुल का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
    गोटुल मुरिया समाज के लिए केवल एक सांस्कृतिक केंद्र नहीं है, बल्कि यह अनुशासन और सामूहिकता का विद्यालय है। यह युवाओं के लिए प्रशिक्षण केंद्र है, जहाँ उन्हें सामाजिक जिम्मेदारियों का बोध कराया जाता है। यह मनोरंजन और नृत्य-गीत का मंच है, जहाँ सामूहिकता और सौंदर्यबोध विकसित होता है। गोटुल परंपराओं और संस्कृति का संवाहक भी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आदिवासी जीवन को जीवित रखता है।

    निष्कर्ष : गोटुल की धड़कन आज भी जीवित
    बस्तर की यह अनोखी परंपरा दिखाती है कि किस प्रकार एक आदिवासी समाज ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखा है। गोटुल आज भी मुरिया युवाओं के लिए संस्कार, अनुशासन और सामुदायिक जीवन का विश्वविद्यालय बना हुआ है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि संस्कृति तभी जीवित रहती है जब उसे जीया जाए, न कि केवल इतिहास की किताबों में पढ़ा जाए।

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