पानी जीवन का आधार है, लेकिन जल संकट आज भी कई क्षेत्रों की प्रमुख चुनौती बना हुआ है। जल संसाधनों को सुरक्षित, संरक्षित और संचालित करने के लिए समस्त संस्थाओं, विभागों और समुदायों को मिलकर समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। PHED (लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग), JJM (जल जीवन मिशन), और PRIs (पंचायती राज संस्थान) को एकीकृत रूप से काम करते हुए जल संरक्षण, सुरक्षित पेयजल, सामुदायिक सहभागिता और जलवायु-प्रतिरोधक WASH प्रथाओं को बढ़ावा देने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
1. जल संरक्षण और पुनर्भरण (Water Conservation & Recharge)
जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण जल संकट को दूर करने का सबसे प्रभावी तरीका है। पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने से भूजल स्तर में सुधार होता है और सूखे की स्थिति में राहत मिलती है।
उदाहरण:
- मध्य प्रदेश के देवास जिले में ‘पानी रोको अभियान’ के तहत 1,500 से अधिक तालाबों और चेक डैम का पुनर्जीवन किया गया, जिससे भूजल स्तर में 4-5 फीट की वृद्धि हुई।
- राजस्थान के अलवर जिले में ‘तरुण भारत संघ’ द्वारा 11,000 से अधिक जोहड़ों का निर्माण किया गया, जिससे सूखा प्रभावित क्षेत्र में पानी की समस्या का समाधान हुआ।
क्या किया जा सकता है:
- चेक डैम और तालाबों का पुनर्निर्माण
- वर्षा जल संचयन प्रणाली को अनिवार्य बनाना
- गांवों में पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण
2. सुरक्षित पेयजल तक पहुंच (Safe Drinking Water Access)
सभी नागरिकों को सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना एक बुनियादी आवश्यकता है। जल स्रोतों की गुणवत्ता की नियमित जांच, पाइपलाइन प्रणाली का विस्तार और जल शुद्धिकरण इकाइयों की स्थापना से सुरक्षित पेयजल तक पहुंच सुनिश्चित की जा सकती है।
उदाहरण:
- बिहार के भागलपुर जिले में फ्लोराइड-प्रभावित गांवों में RO सिस्टम लगाए गए, जिससे हज़ारों लोगों को सुरक्षित पेयजल मिला।
- छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में पाइपलाइन आधारित जल आपूर्ति योजना से 12 गांवों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया गया।
क्या किया जा सकता है:
- जल स्रोतों की नियमित गुणवत्ता जांच
- ग्रामीण क्षेत्रों में पाइपलाइन और RO सिस्टम का विस्तार
- सामुदायिक जल निगरानी समितियों का गठन
3. समुदाय आधारित जल प्रबंधन (Community-Led Water Governance)
जल संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन तभी संभव है जब स्थानीय समुदायों को इसमें सहभागी बनाया जाए। पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं को जल संसाधनों के स्वामित्व और प्रबंधन में सक्षम बनाना जरूरी है ताकि जल संकट का दीर्घकालिक समाधान निकाला जा सके।उदाहरण:
- महाराष्ट्र के हिवरे बाजार में ग्राम पंचायत ने जल प्रबंधन का स्वामित्व लेकर पूरे गांव को जल आत्मनिर्भर बनाया।
- उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में ‘पानी पंचायत’ मॉडल के तहत गांव वालों ने तालाबों का पुनर्जीवन कर जल संकट का समाधान किया।
क्या किया जा सकता है:
- ग्राम स्तर पर जल प्रबंधन समितियों (VWSC) का गठन
- पंचायतों में जल बजट और जल सुरक्षा योजना बनाना
- स्थानीय स्तर पर सामुदायिक निगरानी और रखरखाव
4. जलवायु-प्रतिरोधक WASH प्रथाओं को बढ़ावा (Promoting Climate-Resilient WASH Practices)
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए स्वच्छता और जल संरक्षण से जुड़े व्यवहारों में बदलाव लाना अत्यंत आवश्यक है। ग्रामीण और शहरी समुदायों को जागरूक कर जल-स्वच्छता (WASH) संबंधी व्यवहारों में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।
उदाहरण:
- छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में ‘बस्ती WASH’ कार्यक्रम के तहत महिलाओं को जल और स्वच्छता प्रबंधन में प्रशिक्षित कर गांवों में सफाई और जल संरक्षण की जिम्मेदारी दी गई।
- ओडिशा में ‘Swajal Project’ के तहत महिलाओं और बच्चों को जल-स्वच्छता के प्रति जागरूक किया गया, जिससे 30% से अधिक जलजनित बीमारियों में कमी आई।
क्या किया जा सकता है:
- स्कूलों में WASH कार्यक्रम और व्यवहार परिवर्तन अभियान
- महिला और युवा समूहों को जल प्रबंधन में शामिल करना
- स्वच्छता और जल संरक्षण पर IEC अभियान चलाना
भविष्य की दिशा: समन्वित प्रयास से जल सुरक्षा की ओर
पानी पर समग्र और समावेशी कार्य तभी संभव है जब सभी विभाग और संस्थाएं मिलकर कार्य करें। PHED, JJM और PRIs के बीच समन्वय बढ़ाकर जल परियोजनाओं का एकीकृत कार्यान्वयन किया जा सकता है। जल संसाधनों के संरक्षण के लिए पानी पंचायत मॉडल अपनाकर, जल बजट और जल सुरक्षा योजना को प्राथमिकता देकर, और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को मजबूत करके जल संकट से निपटा जा सकता है।
“पानी की हर बूंद की रक्षा करें और जल आत्मनिर्भर गांवों की ओर कदम बढ़ाएं!”
