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    आज की बात

    सुरक्षित स्वास्थ्य के लिये, सामुदायिक स्तरीय पेयजल स्त्रोतों की निगरानी एवं उपचार

    vikasBy vikasJuly 27, 2024No Comments6 Mins Read0 Views
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    दुषित पानी के कारण बिमारियां
    मानवीय शरीर में 65 से 75 प्रतिशत तक पानी होता है और दुषित पेयजल के कारण मानवीय स्वास्थ्य बहुत बहुत खराब हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में 80 प्रतिशत बीमारियाँ जल द्वारा उत्पन्न होती है। जिनसे पानी परिक्षण के माध्यम से सुरक्षित हो सकते है। इन बिमारियों में हैजा, टाइफाइड बुखार, दस्त, पेचिश, पोलियो, मेनिन्जाइटिस, गैस्ट्रोएंटेराइटिस, शिगेलोसिस जैसी जल जनित बीमारियां शामिल है।

    छत्तीसगढ़ में (दिनांक 20 सितम्बर 2023 को सर्किट हाउस रायपुर में आयोजित जल मंथन में हुई चर्चा के अनुसार) वर्ष 2022-23 में 2.5 लाख लोग दस्त की बिमारी से ग्रसित हुये थे वही इस वर्ष 2023-24 अब तक (29 सितम्बर) 1.5 लाख लोग दस्त की बिमारी से ग्रसित हुये है जोकि गंदगी व गंदे पानी की वजह से होती है।

    इसलिये मानवीय स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिये सुरक्षित पानी की जरूरत है और सुरक्षित पानी के लिये पानी की नियमित निगरानी आवश्यक है।

    छत्तीसगढ़ में पेयजल स्त्रोतों में जीवाणु
    जल जीवन मिशन की बेवसाईट, डब्लूक्यूएमएस से प्राप्त जानकारी के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 में छत्तीसगढ़ में 20 हजार पेयजल स्त्रोत जीवाणु संक्रमित पाये गये थे तथा इस चालू वर्ष 2023-24 अब तक (29 सितम्बर) 2 हजार स्त्रोत जीवाणु संक्रमित पाये गये है, जिसमें मानसूस पश्चात जल परिक्षण में निश्चित ही वृद्धि होगी।

    संक्रमित पेयजल से प्रभावित परिवारों का अनुमान
    250 परिवार संख्या के गांव में औसतन 17 हैण्डपम्प/अन्य पेयजल स्त्रोत उपलब्ध है इस अनुमान से प्रत्येक हैण्डपम्प पर औसतन 15 परिवार पेयजल के लिये निर्भर है। वर्ष 2022-23 में कुल 20 हजार पेयजल स्त्रोतों में संक्रमण पाया गया है जिससे अनुमानतः 3 लाख परिवार प्रभावित हो सकते है।

    सामुदायिक एवं विकेन्द्रित पेयजल निगरानी की आवश्यकता
    छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है जिसमें भूजल व खनीज की मात्रा प्रचूर है। अधिकांश क्षेत्र में भू-जल आसानी से उपलब्ध होने के कारण सार्वजनिक व निजी क्षेत्र में स्थानीय स्तर भू-जल आधारित पेयजल स्त्रोत विकसित किये जा रहे है। कुछ स्थानों पर सतही जल आधारित भी पेयजल हो सकते है। पेयजल स्त्रोतों की संख्या निरंतर बढ़ रही है जिनका उपयोग किया जा रहा है परन्तु पानी की गुणवत्ता की स्थिति पता है ? पानी पीने लायक है या नही ? जिसको पता करने के लिये जल परिक्षण आवश्यक है। जल परिक्षण से ही पानी गुणवत्ता की स्थिति स्पष्ट होती है जिसके आधार पर जल गुणवत्ता प्रबंधन, स्त्रोतों के उपचार, स्वास्थ्य उपचार आदि की कार्ययोजना निर्माण की जा सकती है।

    भौगोलिक दृष्टि से बस्तियां दूर दूर है। इन बस्तियों के पेयजल स्त्रोतों का परिक्षण विकासखण्ड एवं जिले के स्तर से चुनौतिपूर्ण है इसलिये बस्ती या ग्राम स्तर पर ही सामुदायिक भागीदारी से पेयजल निगरानी की व्यवस्था स्थापित किया जाना आवश्यक है जिसके प्रयास जल जीवन मिशन के अन्तर्गत किये भी जा रहे है।

    जीवाणु परिक्षण के लिये समुदाय स्तरीय व्यवस्था क्या हो सकती है

    1. पानी में जीवाणु की स्थिति पता करने के लिये मानसूने के पूर्व 15 मई से 15 जून व मानसून के बाद अक्टूबर व दिसम्बर तक का समय उपयुक्त हो सकता है।
    2. जीवाणु परिक्षण के लिये एच टू एस फिल्ट टेस्टिंग कीट लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा पंचायत को उपलब्ध कराया जाता है। पंचायत मांग कर सकती है या पंचायत स्वयं भी बाजार से यह एच टू एस कीट खरीद सकती है।
    3. छत्तीसगढ़ के गांवों में जल जीवन मिशन के अन्तर्गत जल बहीनियों का चयन किया गया है जोकि प्रशिक्षित है। इसके अतिरिक्त गांव में मितानिन के द्वारा भी परिक्षण किया जाता है। जिनके माध्यम से परिक्षण किया जा सकता है।

    जीवाणु परिक्षण की विधि
    जीवाणु परिक्षण हेतु नमूना कलेक्शन की प्रक्रिया

    1. स्त्रोत से जब तक भू-जल बाहर नही आता है तब तक स्त्रोत से पानी बाहर आने देना उचित होता है ताकि पाईप का पानी बाहर निकल जाये।
      2.एच 2 एस बॉटल खोलने के पहले साबुन से हाथ धुलाई करना।
    2. जांच किये जाने वाले पानी को एच 2 एस बॉटल में मार्किंग तक पानी भरना।
    3. ढक्कन तुरंत बंद करना
    4. पानी भरने के बाद पानी को अच्छे से घूलने के लिये 5 मिनिट तक बॉटल को हिलाना अच्छा हो सकता है।
    5. पानी भरने के बाद बॉटल पर स्त्रोत का नाम, दिनांक, समय, लिखना तथा यह जानकारी रिकार्ड में भी दर्ज करना।
    6. पानी भरने के तुरंत बाद 25 से 37 डिग्रीसेल्सीयस तापमान में रखना ताकि सही परिणाम प्राप्त हो।
    7. 48 घण्टे तक निरिक्षण करना। पानी के रंग में बदलाव पर ध्यान देंना

    पानी में जीवाणु है या नही है ?

    1. यदी पानी का रंग काला हो जाता है, पानी में जीवाणु हो सकता है।
    2. अगर पानी काले रंग बजाया दूसरा कोई रंग होता है तो इसका मतलब है कि पानी किसी भी जीवाणु संक्रमण से मुक्त है।

    परिक्षण के बाद बॉटल का निपटान
    जीवाणुओं को खत्म करने हेतु डिटॉल या फिनाईल का उपयोग किया जा सकता है
    बॉटल वेस्ट कलेक्शन रिक्सा आदि को दिया जा सकता है।

    पानी में जीवाणु संक्रमण के बाद आवश्यक कार्य
    उपयोगकर्ता समुदाय को जानकारी देना कि संक्रमित स्त्रोत का पानी का उपयोग पीने के लिये नही करें।
    घरेलू स्तर पर पानी उपचार करके उपयोग किया जा सकता है।
    पानी के पुनः परिक्षण हेतु लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग से सम्पर्क करना।
    पंचायत के माध्यम से जल परिक्षण हेतु प्रयोग शाला में जल नमूना भेजना।
    प्रयोग शाला से पुनः परिक्षण में जीवाणु पाये जाने पर जल स्त्रोतों का स्वच्छता निरिक्षण करना।
    स्वच्छता निरिक्षण में पाये गये कमियों को दूर करने के लिये कार्ययोजना निर्माण करना।
    जल स्त्रोतों में जीवाणु खत्म करने के लिये क्लोरिन या ब्लिचिंग का उपयोग कर सकते है।

    जल स्त्रोत निरिक्षण के मुद्दे एवं उपाय
    10 मिटर के भितर शौचालय होने या शौचालय के ढलान पर जल स्त्रोत होने पर पेयजल प्रभावित होता है इस स्थिति में वाष्पोर्जन, बॉयो, आदि तकनिकी के माध्यम से सुरक्षित किया जा सकता है।
    स्त्रोत के 10 मीटर के अंदर कोई अन्य प्रदूषण जैसे-मानव मल /जानवरो के मल-मूत्र आदि हो रहा है इस स्थिति में स्त्रोत के पास जानवर नही पहुचे, ऐसी व्यवस्था बनाना होगा।
    जल के 10 मीटर के भितर जल भराव की स्थिति में सोख्ता गड्ढे निर्माण, किचन गार्डन, पौधा रोपण आदि किया जा सकता है।
    स्त्रोत में प्लेट फार्म नही है, प्लेट फार्म 2 मीटर से छोटा है या जल निकास नाली क्षतिग्रस्त है जिसके कारण जल जमाव हो रहा है। इस स्थिति में प्लेट फार्म व नाली निर्माण या मरम्मत की जा सकती है।
    स्थानीय लोग प्रतिदिन स्त्रोत पर नहाते, कपड़ा धोते या बर्तन सफाई करते है इस स्थिति में सामुदायिक निगरानी बढ़ाना ताकि ताकि स्त्रोत की स्वच्छता बरकरार रहे।

    जल, गुणवत्ता प्रबंधन एवं स्त्रोतों के उपचार में विभागीय भागीदारी

    जल परिक्षण एवं उपचार के लिये सामुदायिक स्तर पर मितानिन कार्यकर्ता, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, हैण्ड पम्प मेकानिक, शिक्षक, आ0बा0 कार्यकर्ता, ग्राम पंचायत के सचिव, सरपंच, वार्ड पंच, स्वच्छाग्राही, स्व सहायता समूह एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी पंचायत के नेतृत्व व समन्वय में बढ़ायी जा सकती है।

    उक्त जमीनी स्तरीय कार्यकर्ता एवं उनके विभागों द्वारा फिल्ड टेस्टिंग कीट की उपलब्धता, लैब से कन्फर्मेटिव टेस्ट, संक्रमित स्त्रोत का उपचार, मानव मल का सुरक्षित निपटान, गंदे पानी का प्रबंधन, कचरा प्रबंधन (घरेलू), मेडिकल वेस्ट प्रबंधन, सेनीटरी पैड डिस्पोजल,सुरक्षित पानी की उपलब्धता, जल उपचार आदि कार्य किये जा सकते है।

    उपरोक्त प्रक्रिया के उपयोग से ग्राम स्तर पर सुरक्षित स्वास्थ्य के लिये पेयजल निगरानी मजबूत की जा सकती है।

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