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    आज की बात

    हमारे सरजू दादा: संकल्प, श्रम और संरक्षण की प्रेरक कहानी

    vikasBy vikasJune 8, 2026No Comments5 Mins Read4 Views
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    जहां पानी की कमी है, वहां हरियाली उगाने का सपना

    मध्यप्रदेश का पन्ना जिला बुंदेलखंड क्षेत्र का हिस्सा है, जो वर्षों से जल संकट, अनियमित वर्षा और वर्षा आधारित कृषि की चुनौतियों का सामना करता आया है। यहां अधिकांश किसान मानसून पर निर्भर रहते हैं। बारिश कम होने पर खेत सूख जाते हैं, तालाबों का जलस्तर घट जाता है और गर्मी के दिनों में पेयजल तक का संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे क्षेत्र में हरियाली बचाना और नए पौधों को जीवित रखना किसी संघर्ष से कम नहीं है।

    लेकिन इतिहास गवाह है कि बदलाव हमेशा संसाधनों से नहीं, बल्कि संकल्प से शुरू होता है। ग्राम बनहरीखुर्द–हनुमतपुर के रहने वाले 67 वर्षीय सरजू प्रसाद कोदर, जिन्हें गांव में सभी स्नेहपूर्वक “सरजू दादा” के नाम से जानते हैं, इसी संकल्प और समर्पण का जीवंत उदाहरण हैं।

    एक वादा जिसने बदल दी तस्वीर

    12 अगस्त 2024 का दिन गांव के लिए विशेष था। पर्यावरण एवं जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत संस्था समर्थन ने रिलायंस फाउंडेशन के सहयोग से ग्राम बनहरीखुर्द में एक वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया था। कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती मीना सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थीं। गांव के सैकड़ों महिला-पुरुष, युवा और बच्चे इस आयोजन में शामिल हुए।

    पौधरोपण के दौरान जब पेड़ लगाने की बात हो रही थी, तब कई ग्रामीणों ने अपनी चिंता व्यक्त की।

    “पौधे तो हर साल लगाए जाते हैं, लेकिन पानी और देखभाल के अभाव में कुछ ही महीनों में सूख जाते हैं।”

    यह चिंता वास्तविक भी थी, क्योंकि क्षेत्र में पानी की कमी और भीषण गर्मी के कारण पौधों को जीवित रखना कठिन कार्य था।

    इसी दौरान भीड़ के बीच बैठे सरजू दादा खड़े हुए। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था और आवाज में दृढ़ता।

    उन्होंने कहा—

    “आप पौधे लगाइए, उनकी रक्षा और देखभाल हम करेंगे।”

    उनकी बात सुनकर उपस्थित लोग मुस्कुरा तो दिए, लेकिन शायद किसी ने यह नहीं सोचा था कि सरजू दादा इस वादे को अपने जीवन का मिशन बना लेंगे।

    जब उम्र नहीं, संकल्प काम आता है

    पौधरोपण कार्यक्रम समाप्त हो गया। लोग अपने-अपने कामों में लग गए। लेकिन सरजू दादा अपने वादे को नहीं भूले।

    कुछ ही महीनों बाद गर्मियों का मौसम आया। तापमान बढ़ने लगा। जमीन तपने लगी। तालाबों का पानी कम होने लगा। ऐसे समय में अधिकांश लोगों को लगने लगा कि पौधों को बचा पाना मुश्किल होगा।

    लेकिन सरजू दादा ने हार नहीं मानी।

    उन्होंने स्वयं श्रमदान कर एक छोटा कुआं खोदा। सीमित संसाधनों के बावजूद पानी की व्यवस्था की। फिर रोज सुबह और शाम उस पानी को पौधों तक पहुंचाने लगे। लगभग 80 पौधों की नियमित सिंचाई और देखभाल उन्होंने अपनी जिम्मेदारी बना ली।

    कई बार गांव के लोग उन्हें तेज धूप में पौधों को पानी देते देखते और कहते—

    “दादा, अब आपकी उम्र आराम करने की है।”

    लेकिन उनका जवाब हमेशा एक ही होता—

    “अगर ये पौधे बच गए, तो गांव का भविष्य हरा-भरा हो जाएगा।”

    उनके लिए यह केवल पौधों की देखभाल नहीं थी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित भविष्य का निर्माण था।

    वीरान जमीन से हरित उपवन तक का सफर

    समय बीतता गया और सरजू दादा की मेहनत रंग लाने लगी।

    गांव के बाहर मोड़ और तालाब के आसपास का वह क्षेत्र, जहां कभी सूखी मिट्टी और वीरानी दिखाई देती थी, अब हरियाली से भरने लगा। पौधे बढ़ने लगे, छांव बनने लगी और आसपास का वातावरण बदलने लगा।

    आज वह स्थान एक छोटे से हरित उपवन का रूप ले चुका है। गांव में आने वाले लोगों का स्वागत अब हरे-भरे पौधे और पेड़ करते हैं। यह स्थान केवल एक हरित क्षेत्र नहीं, बल्कि सामुदायिक प्रेरणा का केंद्र बन गया है।

    गांव के लोग जब इस हरियाली को देखते हैं, तो उन्हें याद आता है कि यह बदलाव किसी बड़ी मशीन या बड़े बजट से नहीं, बल्कि एक बुजुर्ग किसान के संकल्प और श्रम से संभव हुआ है।

    पर्यावरण संरक्षण से आजीविका तक

    सरजू दादा की सोच केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रही। उन्होंने हरियाली को आजीविका से भी जोड़ा।

    पौधों की सिंचाई और खेती के लिए उन्होंने एक छोटी टुल्लू मोटर पंप की व्यवस्था की। पानी की उपलब्धता बढ़ने के बाद उन्होंने सब्जी उत्पादन शुरू किया। इससे परिवार को ताजी सब्जियां मिलने लगीं और अतिरिक्त आय का स्रोत भी विकसित हुआ।

    बरसात के मौसम में उन्होंने उगी हुई घास बेचकर लगभग 1,200 रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित की। अब सब्जी उत्पादन से भी परिवार की आर्थिक स्थिति को सहयोग मिल रहा है।

    इस प्रकार उनका प्रयास पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन और आजीविका संवर्धन—तीनों का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है।

    एक व्यक्ति, अनेक संदेश

    सरजू दादा की कहानी केवल पौधों को बचाने की कहानी नहीं है। यह कहानी बताती है कि यदि व्यक्ति ठान ले, तो सीमित संसाधनों में भी बड़े परिवर्तन संभव हैं।

    उन्होंने यह साबित किया है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति यदि अपनी भूमिका निभाए, तो गांव, समाज और प्रकृति सभी को लाभ पहुंच सकता है।

    उनका जीवन हमें सिखाता है कि पौधे लगाना पहला कदम है, लेकिन उन्हें जीवित रखना ही असली सेवा है।

    जैसा कि सरजू दादा कहते हैं—

    “पौधे लगाना आसान है, लेकिन उन्हें एक पिता की तरह सहेजकर बड़ा करना बहुत कठिन है।”

    भविष्य के लिए एक प्रेरणा

    पन्ना जैसे जल संकटग्रस्त और वर्षा आधारित क्षेत्र में सरजू दादा का यह प्रयास एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरा है। उनका कार्य न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है, बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी, श्रम की गरिमा और प्रकृति के प्रति प्रेम की भी मिसाल प्रस्तुत करता है।

    आज सरजू दादा केवल एक किसान नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी सोच के प्रतिनिधि हैं जो मानती है कि परिवर्तन किसी बड़े संसाधन से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे संकल्पों से शुरू होता है।

    उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास देती है कि यदि मन में दृढ़ इच्छा हो, तो बंजर धरती पर भी हरियाली उगाई जा सकती है और कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीदों के नए जंगल खड़े किए जा सकते हैं।

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